15 अगस्त, 1947 को हमारे देश ने आज़ादी की उड़ान भरी. 26 नवंबर, 1949 को देश के संविधान की रचना पूरी हुई और 26 जनवरी, 1950 को भारत को एक गणतांत्रिक देश घोषित कर दिया गया. तब से 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. इसी के साथ शुरू हुई, भव्य परेड की परम्परा. 26 जनवरी के मौके पर होने वाली परेड दुनियाभर में मशहूर है. गणतंत्र दिवस के अवसर आपको कई रोचक चीजें देखने को मिलती हैं.

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गणतंत्र दिवस पर होने वाली भव्य परेड के गवाह तो आप कई बार बने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 26 जनवरी की परेड के लिए किन घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है? आइये जानते हैं कि देश के इस ख़ास पर्व पर परेड के लिए किन घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है?

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गणतंत्र दिवस के मौके पर 61 कैवेलरी घुड़सवार दस्ते का इस्तेमाल किया जाता है. भारतीय थलसेना की विभिन्न रेजिमेंट्स में 61वीं कैवेलरी की अनोखी विशिष्टता है कि ये विश्व में एकमात्र अयांत्रिक (Non-Economic) घुड़सवार सेना है. आधुनिक यंत्रीकृत युद्ध कला से पहले राजाओं व सम्राटों की शक्ति का अंदाज़ा उनकी घुड़सवार सेना को देखकर लगाया जाता था. मुग़ल शासन के दौरान भारत में प्रत्येक कुलीन (Noble) का ओहदा उसके पास मौजूद घोड़ों की संख्या से तय होता था.

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वहीं मुग़लकाल और 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय तक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी, जिस वक़्त अंग्रेज़ भारत से गये, तब सैन्य अस्तबलों में भारतीय रजवाड़ों की शाही टुकड़ियों के घोड़े ही बचे हुये थे. वहीं सन् 1951 में राज्यों की सेनाओं को भारतीय थलसेना से मिला दिया गया. इसके बाद करीब 4-5 घुड़सवार सेना की इकाईयों का निर्माण हुआ. 1 अक्टूबर 1953 को ग्वालियर में न्यू हॉर्स्ड कैवेलरी रेजिमेंट के नाम से इसकी स्थापना की गई. साल 1954 जनवरी में इसका नाम बदलकर 61वीं कैवेलरी रेजिमेंट रख दिया गया.

61वीं कैवेलरी भारत के विभिन्न सैन्य अकादमियों और घुड़सवार खेल जैसे पोलो, टेंट पेगिंग, शो-जंपिंग, ड्रेसेज और ट्रिक-सवारी में घुड़सवारी प्रशिक्षण का मुख्य आधार भी है.

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