फ़िल्मों की सबसे बड़ी ताकत ये होती है, कि वो साधारण सी लगने वाली कहानी को भी मज़ेदार बना देती हैं. लेकिन कभी-कभी असल ज़िन्दगी की कोई घटना इतनी फ़िल्मी होती है कि अगर उसे जस का तस भी दिखा दिया जाए, तो वो किसी हिट से कम न हो.

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ये कहानी है मुंबई पुलिस के एनकाउंटर कॉप, प्रदीप शर्मा की. 9 साल पहले सेवा से निष्काषित किये गए प्रदीप शर्मा की मुंबई पुलिस में फिर से वापसी हो रही है. 9 साल पहले 2008 में उन्हें छोटा राजन के ख़ास लखन भैय्या के फ़र्ज़ी एनकाउंटर में नाम आने से सेवा से निकाला गया था.

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मुंबई पुलिस के इस सबसे नामचीन पुलिसवाले का Career किसी सितारे की तरह ही उतार-चढ़ाव भरा रहा. हर अच्छी कहानी की तरह, उनकी कहानी भी सुनाई जानी ज़रूरी है. 

उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र के धूलिया आया शर्मा परिवार. परिवार के कमाऊ व्यक्ति, रामेश्वर शर्मा एक हिंदी टीचर थे लेकिन बेटा सीधे निकला पुलिस फ़ोर्स में. प्रदीप शर्मा ने मुंबई पुलिस सर्विस कमिशन का एग्ज़ाम क्लियर किया और पुलिस से सबसे नामदार अफ़सर, अरविन्द ईनामदार की देख-रेख में नाशिक पुलिस अकादमी में ट्रेनिंग ली.

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इस बैच से मुंबई पुलिस का कुख़्यात एनकाउंटर गैंग निकला था. प्रदीप शर्मा, प्रफ़ुल भोंसले, शिवाजी कोलेकर, विनायक सावड़े, विजय सालस्कर, रविंद्र आंग्रे, स्वर्गीय राजू पिल्लै, अशोक बोरकर, असलम मोमिन. राजू पिल्लै को छोड़ कर, सभी पुलिस वाले जनता और मीडिया की नज़रों में कभी तारे बने, तो कभी उनकी आंख की किरकिरी.

शर्मा की सबसे पहली पोस्टिंग हुई माहिम स्टेशन में, वहीं से उन्हें स्पेशल ब्रांच ट्रांसफ़र किया गया. इस दौरान प्रदीप शर्मा की नज़दीकियां छोटा राजन गैंग से बढ़ी. लेकिन इस गैंग की ख़बर रखने वाले ओ.पी. सिंह, जो शर्मा का Informerभी था, उसके मारे जाने के बाद शर्मा दाऊद गैंग की तरफ़ मुड़े.

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मुंबई में 80 का आखरी दशक वो था, जब अंडरवर्ल्ड से जुड़े सभी लोगों को एक-एक कर पुलिस के ये एनकाउंटर स्पेशलिस्ट मार रहे थे. उन्हें ऊपर से खुली छूट मिली थी क्योंकि वो अंडरवर्ल्ड की जड़ों को कमज़ोर कर रहे थे. किसी डॉन का एनकाउंटर करने के बाद मीडिया ब्रीफ़िंग में भी प्रदीप और उनके साथी कहते कि हम अपराधी को पकड़ रहे थे, उसने सहयोग नहीं किया,Retaliate करने या भागने की कोशिश की और हमने गोली चला दी.

प्रदीप शर्मा और उनके सभी साथी, अब तक अच्छे-ख़ासे एनकाउंटर कर चुके थे, ख़ुद शर्मा के खाते में उनके सस्पेंड होने तक 112 एनकाउंटर थे. शर्मा ने विनोद मटकर, परवेज़ सिद्दीकी, रफ़ीक डब्बावाला, सादिक कालिया और LeT के तीन आदमियों का ख़ात्मा किया था.

ये वो समय था, जब एनकाउंटर के ख़ूनी खेल को न चाहते हुए भी पुलिस की रज़ामंदी मिल गयी थी. ये वो दौर था, जब प्रदीप शर्मा, विजय सालस्कर, असलम मोमिन की पहुंच अंडरवर्ल्ड की एक-एक चीज़ पर थी.

प्रदीप शर्मा अपने एनकाउंटर ऑपरेशन की वजह से कई दफ़े सुर्ख़ियों में आ चुके थे लेकिन जैसे ही मीडिया ने इस तरह हो रहे धड़ाधड़ एनकाउंटर्स पर सवालिया निशान लगाने शुरू किये, उनमें सबसे पहला नाम भी प्रदीप शर्मा का आया. तब तक सीनियर इंस्पेक्टर बन चुके शर्मा के लिए कहा जाता था कि मुंबई में कहीं भी Extortion मनी में उनकी हिस्सेदारी हमेशा रहती थी.

भू-माफ़िया की तरह काम करते हुए एक दोस्त बिल्डर के लिए प्लाट हथियाने के आरोप सहित, 2003 में उनकी कस्टडी में हुई ख़्वाजा यूनुस की मौत के बाद शर्मा का ट्रांसफ़र करवा दिया गया. लखन भैय्या के फ़र्ज़ी एनकाउंटर में भी शर्मा का नाम आया, अंडरवर्ल्ड में उनकी पैठ और 5000 करोड़ की संपत्ति जैसी सभी बातें शर्मा के ख़िलाफ़ गयी और पुलिस का एक धाकड़ एनकाउंटर स्पेशलिस्ट चकाचौंध के हत्थे चढ़ गया. 

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