आपको शायद ही याद होगा, 2014 में एक वीडियो वायरल हुई थी, जिसमें दो लड़कियां (आरती और पूजा) बस में कुछ लड़कों को बेल्ट से पीट रही थी. लड़कियों के समर्थन में #RohtakBraveHearts हैशटैग चल रहा था. मीडिया वालों ने उन दोनों लड़कियों को सिर-आंखों पर बैठा लिया था. सब ओर से वाह-वाह मिल रही थी. पिटने वाले लड़कों के लिए हर किस्म के बुरे विशेषण इस्तेमाल किए गए. मामला न्यायलय तक पहुंचा, वहां क्या हुआ?

कोर्ट ने कुलदीप, दीपक और मोहित को बरी कर दिया, जांच से पता चला कि लड़कियां झूठ बोल रहीं थी. वीडियो में दिखने वालों लड़कों की कोई ग़लती नहीं थी, भरी बस में लड़कियों ने इन बेकसूर लड़कों को पीटा, आस-पास के लोगों से सहायता नहीं मिलती देख उन्हें बस से उतर कर भागना पड़ा था.

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इस घटना ने इन तीनों लड़कों की ज़िंदगी बदल दी या यूं कहें कि बिगाड़ दी. किसी की नौकरी छूटी तो किसी की पढ़ाई, मीडिया ने इन्हें देश का खलनायक बना दिया था. कोई इनका पक्ष सुनने या मानने को तैयार नहीं थी. हालांकि कुछ न्यूज़ चैनल ने इनकी बात को कुछ दिनों बाद दिखाया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

इस मामले के ऊपर पहला फ़ैसला मार्च, 2017 में ही आ चुका था. तब कोर्ट ने लड़कों बरी कर दिया था. ये साबित हो गया था कि लड़कियों ने शोषण और छेड़छाड़ का ग़लत आरोप लड़कों पर लगाया है. लड़कियों ने ये बात छुपाई थी कि मार-पीट बस की सीट के लिए हुई थी. पुलिस ने भारतीय दंड सहिता के तहत लड़कियों के कहे अनुसार लड़कों पर सेक्शन 354A के अंतर्गत केस दर्ज किया था.

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Lie Detector टेस्ट में लड़कियों के बयान संदेहस्पद लगे और लड़कों के बयान में किसी प्रकार के झूठ का पता नहीं चला. कोर्ट में चश्मदीद गवाहों ने भी बताया कि बहस सीट के लिए हुई थी. साढ़े तीन साल तक चले मुक़दमें में कोर्ट ने पाया कि लड़को पर लगाए गए आरोप निराधार हैं.

बाद में सेशन कोर्ट ने भी 11 सितंबर को दिए फ़ैसले में निचली अदालत के फ़ैसले को बरकरार रखा. कोर्ट ने पाया कि जांच और फ़ैंसले में किसी प्रकार अनियमितता नहीं बर्ती गई है.

कोर्ट के बाद मीडिया की बारी

कोर्ट से न्याय मिलने के बाद कुलदीप, दीपक और मोहित चाहते हैं कि मीडिया भी न्याय करे. क्योंकि मीडिया ने ही इन्हें दोषी बनाया था. बिना किसी जांच के मीडिया ने इन तीन निर्दोष लड़कों को कटघरे में खड़ा कर फ़ैसला सुना दिया था.

एक मीडिया संस्थान से फ़ोन पर बात चीत के दौरान कुलदीप ने भावुक स्वर में कहा, 'हमारी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई. सबने हमे ऐसे देखा जैसे हम कोई ख़तरनाक मुजरिम हैं. कई दिनों तक मीडिया हमारे पीछे पड़ी रही. हमने आर्मी का मेडिकल टेस्ट पास कर लिया था लिखित परीक्षा देना बाकी था. इस घटना की वजह से सेना ने हमें परीक्षा देने से प्रतिबंधित कर दिया.'

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'पिछले चार सालों में हम तीनों ने बहुत बुरे दिन देखे हैं. हम बेरोज़गार रहे, खेतों में काम कर के अपना गुज़ारा चला रहे हैं. अगर मीडिया ने ऐसा नहीं किया होता तो हमारे पास भी रोज़गार होता. बिना जांच किए मीडिया ने हमे दोषी ठहरा दिया. अब जब हमें क़ानून ने निर्दोष बता दिया, कोई इसके ऊपर बात नहीं कर रहा,' कुलदीप ने कहा. कुलदीप को इस घटना के लिए चार दिनों तक जेल में रहना पड़ा था.

इस केस के दूसरे आरोपी दीपक को भी पुलिस ने तत्काल ही गिरफ़्तार कर लिया था. उसने बताया कि उसे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी. वो आर्ट्स से बेचलर्स कर रहा था. वो कॉलेज की परीक्षा में भी नहीं बैठा. जिस डिग्री को वो तीन साल में पूरा कर सकता था, दीपक को उसमें पांच साल लग गए. इस केस की वजह से दीपक को कहीं नौकरी भी नहीं मिली.

मुख्यमंत्री का वादा

तीनों लड़के Assan गांव से ताल्लुक रखते थे. गांव के सरपंच राज सिंह बताते हैं कि हम तब लड़कों के लिए मुख्यमंत्री से मिले थे. उन्होंने वादा किया था कि अगर इनमें से कोई भी निर्दोष पाया गया तो उसे नौकरी दी जाएगा. फ़ैसला आने के बाद कई बार मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधी से मिलने की कोशिश की गई लेकिन सफ़लता नहीं मिली. इस घटना के लिए आरती और पूजा को 26 जनवरी के मौके पर राज्य सरकार की ओर से पुरस्कार और 31,000 धन राशि मिली थी.

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