इन दिनों सोशल मीडिया के एक ख़ास वर्ग में ईरानी शायर सबीर हका की काफ़ी चर्चा हो रही है. ईरानी कवि सबीर के बारे में कहा जाता है कि लेखन से वो इतने पैसे नहीं कमा पाते कि पेट भर सकें इसलिए वो मज़दूरी भी करते हैं. सबीर के लेखन को ईरान की श्रमिक कविता स्‍पर्धा में प्रथम पुरस्‍कार भी दिया जा चुका है, पर यदि पुरस्कारों से ही पेट भरता, तो सबीर को ईंट-रोड़ा नहीं ढोना पड़ता.

एक इंटरव्यू में सबीर अपने शब्दों को कविताओं में पिरोते हुए कहते हैं कि

''मैं थका हुआ हूं. बेहद थका हुआ. मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं. मेरी 'मां' मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं.मैं अपनी 'मां' की थकान महसूस कर सकता हूं. उसकी थकान अब भी मेरे जिस्‍म में है.''

सबीर ने ज़्यादा नहीं लिखा, पर जितना भी लिखा वो ऐसा था कि आंतरिक मन पर प्रहार करने के साथ ही सोचने को मजबूर कर देने वाला है. इस बारे में साबिर कहते हैं कि 'उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वो सोने का कोई स्थाई ठिकाना बना सके. उनकी कई रातें सड़क पर भटकते हुए गुज़रती हैं. इस वजह से उन्‍हें इतना वक़्त नहीं मिलता कि वो अपना कोई उपन्‍यास पूरा कर सकें.'

आज जब एक बार फिर सबीर के बारे में सोशल मीडिया में चर्चा होने लगी है, तो हम भी उनकी कुछ कविताओं का संकलन आपके लिए ले कर आये हैं. ये कवितायें मूल रूप से पारसी में छपी हैं, पर गीत चतुर्वेदी के अनुवाद के कारण ये हिंदी में भी उपलब्ध हैं. गीत चतुर्वेदी ख़ुद भी एक जाने-माने हिन्दू लेखक हैं और मौजूदा साहित्य जगत में अपने लेखन द्वारा दख़लन्दाज़ी करते रहते हैं. इन कविताओं का अनुवाद करते वक़्त गीत ने इस बात का ख़ास ख़्याल रखा है कि कविताओं के मूल भाव को बचाया जा सके.

दोस्‍ती

मैं 'ईश्‍वर' का दोस्‍त नहीं हूं इसका सिर्फ़ एक ही कारण है जिसकी जड़ें बहुत पुराने अतीत में हैं जब छह लोगों का हमारा परिवार एक तंग कमरे में रहता था और (ईश्‍वर) के पास बहुत बड़ा मकान था जिसमें वह अकेले ही रहता था

बंदूक़

अगर उन्‍होंने बंदूक़ का आविष्‍कार न किया होता, तो कितने लोग, दूर से ही, मारे जाने से बच जाते. कई सारी चीज़ें आसान हो जातीं. उन्‍हें मज़दूरों की ताक़त का अहसास दिलाना भी कहीं ज़्यादा आसान होता.

घर

मैं पूरी दुनिया के लिए कह सकता हूं यह शब्‍द दुनिया के हर देश के लिए कह सकता हूं मैं आसमान को भी कह सकता हूं इस ब्रह्मांड की हरेक चीज़ को भी. लेकिन तेहरान के इस बिना खिड़की वाले किराए के कमरे को नहीं कह सकता, मैं इसे घर नहीं कह सकता.

आस्‍था

मेरे पिता मज़दूर थे आस्‍था से भरे हुए इंसानजब भी वह नमाज़ पढ़ते थे (अल्‍लाह) उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था.

ईश्‍वर

ईश्‍वर भी एक मज़दूर है ज़रूर वह वेल्‍डरों का भी वेल्‍डर होगा. शाम की रोशनी में उसकी आंखें अंगारों जैसी लाल होती हैं, रात उसकी क़मीज़ पर छेद ही छेद होते हैं.

शहतूत

क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है, जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है. गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं. मैंने कितने मज़दूरों को देखा है इमारतों से गिरते हुए, गिरकर शहतूत बन जाते हुए.

सरहदें

जैसे कफ़न ढंक देता है लाश को बर्फ़ भी बहुत सारी चीज़ों को ढंक लेती है. ढंक लेती है इमारतों के कंकाल को पेड़ों को, क़ब्रों को सफ़ेद बना देती हैऔर सिर्फ़ बर्फ़ ही है जो सरहदों को भी सफ़ेद कर सकती है.

हालांकि हम ये नहीं जानते कि सबीर की कविताओं के साथ फैलाई जा रही कहानियां सच हैं या झूठ? पर उनकी कवितायें वाकई में उस संसार की तरफ़ सोचने को विवश कर रही हैं, जिसे लोग देखकर भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं. इसके लिए गीत चतुर्वेदी भी उतने ही बधाई के पात्र हैं, जितने कि साबिर, जो उन्होंने इतनी ख़ूबसूरत कविताओं को अनुवाद कर हिंदीभाषी लोगों को भी पढ़ने और समझने का मौका दिया.