एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि नलों में आने वाले पानी, जिसे लोग रोज़ाना पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं उसमें पानी के साथ प्लास्टिक के सूक्ष्म कण (Microscopic Plastic Fibres) भी आ रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं. हालांकि, अभी इसकी जांच होना बाकी है कि ये कितने हानिकारक हैं.

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Orb और University Of Minnesota की ओर से की गई एक रिसर्च में ये बात सामने आई है. इस रिसर्च के लिए दुनिया के 12 से ज़्यादा देशों के पानी के सैंपल्स की जांच हुई. पानी के इन सैंपल्स में से 83 प्रतिशत में प्लास्टिक के अतिसूक्ष्म कण मिले हैं.

इस रिसर्च में भारत की राजधानी दिल्ली में सप्लाई होने वाले पानी के सैम्पल्स को भी शामिल किया गया. Orb Media Study के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के 17 इलाकों से कलेक्ट किये गए पानी के नमूनों की जांच में पता चला कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किये जा रहे पीने के पानी में माइक्रोस्कोपिक प्लास्टिक फ़ाइबर्स हैं.

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उदाहरण के लिए प्रीत विहार और मालवीय नगर के इलाकों की बात करें तो यहां से लिया गया पानी का सैंपल भूमिगत था. दिल्ली जल बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 'शहर में जल आपूर्ति पूरी तरह से मेटल पाइप्स से की जाती है. हम ये नहीं कह सकते कि प्लास्टिक के पाइप्स के कारण ये सूक्ष्म कण पानी में मिल रहे हैं. हमें इसमें आगे की कार्रवाई करने से पहले माइक्रोप्रॅलिसिक्स के बारे में विस्तार से सब कुछ जानना होगा.'

हालांकि, University Of Minnesota में इन नमूनों का परीक्षण करने वाली शोधकर्ता Mary Kosuth ने Indian Express को एक ईमेल Interview में बताया, 'हम पूर्ण निश्चितता के साथ नहीं कह सकते हैं कि पानी में पाए गए सूक्ष्म कण प्लास्टिक ही थी, लेकिन वो संभवतः Anthropogenic Fibres हैं. इसकी पुष्टि करने के लिए आगे की जांच होनी चाहिए.' Anthropogenic Fibres वो पर्यावरणीय प्रदूषण या प्रदूषक हैं, जो मानव गतिविधि से उत्पन्न होते हैं.'

पार्टनर एनजीओ, Toxics Link की दिल्ली स्थित शाखा द्वारा घरों में आने वाले पानी 15 सैम्पल्स में 14 में माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए.

जांच के लिए यूज़ किये गये पानी का उपयोग घरेलू प्रयोजनों जैसे कपड़े धोने, बर्तन धोने, साफ़-सफ़ाई और नहाने लगभग सभी के लिए किया जा रहा है. लेकिन केवल एक केस में इस पानी का इस्तेमाल पीने के लिए किया जाता है, जबकि पानी को फ़िल्टर किया गया हो. लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शुद्ध में इस्तेमाल किया गया पानी फ़िल्टर नहीं किया गया था. इस रिसर्च में ऐसे क्षेत्रों से नमूनों को शामिल नहीं किया गया है, जहां के निवासी सीधे नल में आने वाले पानी को पीते हैं. केवल तीन जगहों एमबी रोड, जंगपुरा एक्सटेंशन और सरिता विहार के नमूनों में ऐसे कण नहीं पाए गए.

वहीं शोधकर्ता मानते हैं कि इस स्टडी में पानी का विवरण जैसे पानी का स्रोत क्या है, इसको साफ़ करने के लिए किस मेथड का यूज़ किया गया है, जो इसे इंसान के योग्य बनाते हैं आदि. ये स्टडी अपनी तरह की पहली स्टडी है, जो चौड़ाई पर केंद्रित है, गहराई पर नहीं. State University Of New York के प्रोफ़ेसर, Sherri Mason जिनकी देख रेख में Orb का ये अध्ययन किया गया, ने Indian Express को बताया, 'हम ये देखना चाहते थे कि ये एक वैश्विक समस्या है या कोई ख़ास क्षेत्र इस समस्या से दूसरों की तुलना में अधिक प्रभावित है.'

अध्ययन में कहा गया है कि पानी के नमूनों को High-Density Polyethylene (HDPE) की बोतलों में ही लिया गया, जिससे Hdpe के कणों का प्लास्टिक के कणों से अंतर करना आसान हो. प्रत्येक नमूने को डायरेक्ट पानी के नल से ही बोतलों में भरा गया, वो भी काफी देर बहने के बाद.

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गोवा के National Institute Of Oceanography के पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक, रामाय्या नागप्पा ने Indian Express को बताया, 'यह कहने के लिए एक बहुत मजबूत स्टेटमेंट है कि नल का पानी में माइक्रोप्रैस्टिक्स शामिल है', इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दिल्ली जैसे शहरों में पानी को शुद्ध करने के उच्च से उच्तर विधियां और प्लांट्स हैं. हालांकि, समुद्र के पानी के लिए ये मुद्दा मायने नहीं रखता है. औसतन, आपको समुद्र के पानी में प्रति लीटर 1.5 से 2 कण प्लास्टिक के मिल जाएंगे. लेकिन मैं गोवा के नल के पानी में इस तरह के परिणाम विश्वास नहीं कर सकता हूं.'

वो कहते हैं कि इस परिणाम को दोबारा कांच की बोतलों में पानी के नमूनों को भरकर उसके उपयोग की पुष्टि की जानी चाहिए क्योंकि इस बात का पुष्टिकरण भी करना ज़रूरी है कि कहीं प्लास्टिक के कण Hdpe बोतलों से तो नहीं आ रहे हैं. मैं ये नहीं कह सकता कि नल के पानी में Microplastics हैं.'

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