अक्षय कुमार इन दिनों अपनी आने वाली फ़िल्म 'पैडमैन' के प्रमोशन में काफ़ी व्यस्त हैं और इसके लिए किसी भी पब्लिक इवेंट में किसी न किसी टॉपिक के ज़रिये फ़िल्म का नाम ले ही लेते हैं. और इसी का नतीजा है कि फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही लोगों के दिलों-दिमाग पर चढ़ गई है. 25 जनवरी को रिलीज़ होने वाली इस फ़िल्म का निर्देशन आर. बाल्की ने किया है और इसमें सोनम कपूर और राधिका आप्टे भी मुख्य किरदारों में हैं. महिलाओं की माहवारी यानि पीरियड्स से जुड़ी ये फ़िल्म एक बायोपिक है जो अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने अपने गांव की महिलाओं के लिए सस्ते पैड्स बनाये. ख़ैर, ये तो बात हुई फ़िल्म की और अब बात करते हैं अक्षय कुमार द्वारा दिए गए सराहनीय स्टेटमेंट की.

आपको पता ही होगा कि पिछले कुछ सालों से बॉलीवुड का ये खिलाड़ी लीक से हटकर और सोशल इशूज़ पर बनी फ़िल्मों में नज़र आ रहे हैं. पिछले साल उन्होंने 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' से महिलाओं की खुले में शौच की समस्या को उठाया था और बताया था कि घर में शौचालय कितना ज़रूरी है. वहीं अब वो 'पैडमैन' के ज़रिये महिलाओं के पीरियड्स और उनसे जुड़ी समस्याओं को लेकर आ रहे हैं.

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Indiatimes की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में पुणे में अक्षय कुमार ने फ़िल्म को प्रमोट करते हुए एक बहुत बड़ी बात कही जो सौ फ़ीसदी सच भी कि महिलाओं के लिए सैनिटरी नैपकिन बिल्कुल फ़्री होने चाहिए.

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इस फ़िल्म प्रमोशन के दौरान अक्षय ने कहा, 'महिलाएं टैक्स फ़्री सैनेटरी पैड्स की बात कर रही हैं लेकिन मेरा मानना है कि ये बिल्कुल फ़्री होने चाहिए.' इसके साथ ही उन्होंने कहा कि डिफ़ेंस में पांच प्रतिशत की कटौती कर दीजिए, एक बम कम बनाइए, और महिलाओं को ये पैसा सैनेटरी नैपकिन खरीदने के लिए दीजिये.' अक्षय की ये बात सौ प्रतिशत सही भी है. पहली बार किसी पुरुष ने सैनेटरी पैड को फ़्री करने की बात की है.

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गौर करने वाली बात है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने Goods and Services Tax (GST) लागू किया था जिसके बाद से रोज़मर्रा की कई वस्तुएं महंगी हो गयीं हैं. GST के लागू होने के बाद जहां कंडोम को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया, और बिंदी, सूरमा, सिंदूर जैसी चीज़ों पर टैक्स हटाया गया, वहीं सैनेटरी नैपकीन पर 12 प्रतिशत टैक्स लगा दिया गया. उसके बाद से ही सोशल मीडिया पर सैनेटरी पैड्स पर लगे 12 प्रतिशत टैक्स का महिलाओं ने खुल कर विरोध किया. यहां सवाल ये है कि क्या महिलाओं के लिए श्रृंगार का सामान सैनेटरी नैपकिन से ज़्यादा ज़रूरी है?

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अभी भी इस मुद्दे को लेकर बहस चल रही है. शायद आने वाले समय में सैनेटरी नैपकीन को टैक्स फ़्री भी कर दिया जाए. लेकिन सोचने वाली बात ये है कि एक तरफ तो सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. कई सरकारी संगठनो द्वारा ग्रामीण और शहरी महिलाओं को पीरियड्स के दिनों में स्वच्छ रहने की ज़रूरी जानकारी और नैपकीन की उपयोगिता बारे में जागरुक किया जा रहा है. और अब जब महिलायें इसके इस्तेमाल को लेकर सजग हो रही हैं तो सरकार ने सैनेटरी पैड्स पर टैक्स लगा कर उनको एक बार फिर रोक दिया. देखा जाए तो कामकाजी महिलायें तो एक बार फिर नैपकीन खरीदने में सक्षम हैं, लेकिन ग्रामीण महिलाओं के लिए ये थोड़ा मुश्किल है. और अगर यही स्थिति रही तो ऐसे में महिलाएं फिर से कपड़ा यूज़ करेंगी, फिर से वो तरह-तरह की बीमारियों और इन्फ़ेक्शन्स का शिकार होंगी. साथ ही सरकार द्वारा चलाये जा रहे सारे के सारे सोशल कैम्पेन धरे के धरे रह जाएंगे.

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सरकार को समझना चाहिए कि किसी भी महिला के लिए सैनेटरी पैड्स कोई मेकअप का सामान नहीं, या कोई लग्ज़री प्रोडक्ट नहीं, बल्कि ज़रूरी है, फिर चाहे वो शहरी महिला हो या ग्रामीण. और इसको तो फ़्री ही होना चाहिए, कम से कम उन महिलाओं के लिए जो मेहनत-मज़दूरी कर अपना गुज़र बसर कर रही हैं. मैं अक्षय कुमार की इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं. जहां कई महिलायें सैनेटरी पैड्स पर लगे GST को हटाने की मांग कर रही हैं, वहीं एक पुरुष की तरफ से सैनेटरी पैड्स को बिल्कुल फ़्री करने बात सराहनीय है.

आपकी इस बारे में क्या राय है कमेंट करके ज़रूर बताइयेगा.