देश की सीमा पर वतन की सुरक्षा करते हुए जब भी कोई जवान शहीद होता है, तो कुछ दिनों तक उसकी बहादुरी और अदम्य साहस के किस्से हर तरफ सुनाई देते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीतता जाता है लोग उन्हीं शहीदों के नाम भूल जाते हैं. देश की आज़ादी के लिए हुए स्वतंत्रता संग्राम में हज़ारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, पर आज कितनों के नाम हम लोगों को याद हैं, शायद कुछ के ही.

ऐसा नहीं है कि हम उनके नाम याद नहीं रख सकते, पर इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में वक़्त ही नहीं है किसी के पास किसी के लिए. मगर इन सब से इतर एक व्यक्ति पिछले 17 सालों से देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर चुके शहीदों के परिजनों को चिट्ठियां लिख रहा है.

आइये आज आपको मिलवाते हैं इस देशभक्त से

सूरत की एक प्राइवेट फ़र्म में बतौर सुरक्षाकर्मी काम करने वाले 37 वर्षीय जितेंद्र सिंह पिछले 17 सालों से ये काम कर रहे हैं. शहीदों को श्रद्धांजलि देने की भावना से वो उनके परिजनों के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं. वो ये चिट्ठियां इसलिए भी लिखते हैं, ताकि शहीदों के परिवार वालों को ये एहसास दिला सकें कि कोई है, जो उनके बारे में सोचता है.

जितेंद्र राजस्थान के भरतपुर जिले में कुटखेड़ा गांव के निवासी हैं. वो देश के वीर जवानों का बहुत सम्मान करते हैं और उनकी कुर्बानियों की कहानियां अपने बेटे को भी सुनाते हैं. इतना ही नहीं जितेंद्र ने अपने बेटे का नाम हरदीप सिंह रखा है. आपको बता दें कि ये नाम उन्होंने जम्मू-कश्मीर में 2003 में हुए आतंकी हमले में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद सैनिक, हरदीप से प्रेरित होकर रखा है.

गौरतलब है कि उनके पास तकरीबन 20,000 शहीदों का पूरा ब्यौरा है. इस रिकॉर्ड में शहीदों के नाम, यूनिट नंबर, उनका पता आदि सभी डिटेल्स मौजूद हैं. साथ ही अभी तक वो शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को 3000 से भी ज़्यादा पत्र लिख चुके हैं ,जो शहीदों के प्रति जितेंद्र के सम्मान को दर्शाते हैं. आपको बता दें कि जितेंद्र अपने सभी लेटर्स में ये लिखना नहीं भूलते कि अगर इस देश के नागरिक अमन चैन से हैं, तो उन शहीदों की वजह से हैं.

जितेंद्र इस बारे में बात करते हुए कहते हैं, 'मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूं और हमारी आर्थिक स्थिति भी ज़्यादा अच्छी नहीं है, इसलिए ये काम मेरे लिए ज़्यादा आसन नहीं है. मेरे घरवालों को लगता है कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन मैंने भी यह दृढ-संकल्प लिया है कि जब तक मैं जिंदा रहूंगा, तब तक अपने देश के इन वीर सपूतों को इसी तरह से श्रद्धांजलि अर्पित करता रहूंगा और उनके परिजनों को पत्र लिखता रहूंगा.'

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले 17 सालों से ये पत्र लिखने और भेजने के लिए जितेंद्र पोस्टकार्ड सहित अन्य ख़र्च भी अपनी जेब से ही करते हैं.

इसके साथ ही वो बताते हैं, 'मैं इन पत्रों को कारगिल युद्ध के समय से लिख रहा हूं. मेरे हिसाब से सेना में जाना एक कठिन काम है और यह देश का कर्तव्य है कि उन शहीदों का सम्मान किया जाए, जिन्होंने हमारे लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया. ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनों को खोने के बाद बहुत ही दुःख और कठिनाई के साथ जी रहे हैं. हमें उन परिवारों के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए.'
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जब जितेंद्र के पास इन पत्रों के जवाब आते हैं, तो वो उनके लिए बेहद खुशनुमा पल होता है. उनको ऐसा लगता है मानो उनकी मुराद पूरी हो गई हो. वो बताते हैं कि एक बार एक शहीद जवान के पिता ने उनको फ़ोन भी किया था और वो उनसे मिलना चाहते थे. पर मिल नहीं पाए. जितेंद्र के इस सराहनीय काम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है.

अगर देश का हर व्यक्ति शहीदों के नाम ऐसे पत्र लिखकर भेजे, तो देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले इन सपूतों के घरवालों को बहुत साहस और बल मिलेगा.

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