बीते सोमवार को दिल्ली में अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर स्टंट करना और सेल्फ़ी लेना दो छात्रों को महंगा पड़ गया. दरअसल, शुभम सैनी (15) और यश (15) नाम के दो छात्र ट्रैक पर स्टंट और सेल्फ़ी लेने का काम कर रहे थे, जिससे ट्रेन की चपेट में आकर उनकी मौत हो गई. सच कहूं, तो ज़िंदगी को दांव पर लगाकर रेलवे ट्रैक पर सेल्फ़ी लेना इन दोनों छात्रों को महंगा पड़ गया.

अब सवाल उठता है कि इस सेल्फ़ी के कल्चर से हासिल क्या हो रहा है सिवाय मौत के. जिस संस्कृति को अपनाने में हमारी मौत सुनिश्चत है, आखिर हम उसे सही कैसे ठहरा सकते हैं? आये दिन सेल्फ़ी से मौत की ख़बरें समाचारों की सुर्खियों में रहती हैं, मगर अफ़सोस कि हम उनसे सबक नहीं ले पा रहे हैं.

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लाइक्स और कमेंट बटोरने के चक्कर में हो रही हैं मौतें

सेल्फ़ी लेने का क्रेज जिस कदर युवाओं में बढ़ रहा है, उस हिसाब से सेल्फ़ी को 'अंतर्राष्ट्रीय कार्य' घोषित करने में कोई बुराई नहीं है. पूरी दुनिया में सेल्फ़ी का क्रेज दरअसल एक घातक एडवेंचर साबित हो रहा है, जहां मौज-मस्ती की चाह और कुछ नया कर गुज़रने की ख्वाहिश रखने वाले लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है. इसके पीछे की एक और मुख्य वजह है कि सेल्फ़ी के दीवाने अब ये मानने लगे हैं कि सोशल मीडिया पर जिसकी जितनी आकर्षक और लीक से हटकर सेल्फ़ी होगी, उस पर ‘लाइक्स’ और कमेंट उतने ही ज़्यादा होंगे. नौबत ये आ गई है कि सेल्फ़ी के बहाने लोग खुद अपनी मौत को दावत दे रहे हैं.

राष्ट्रीय रोग की तरह उभर रहा है सेल्फ़ी कल्चर

अमेरिकन सैकियाट्रिक असोसिएशन के अनुसार, दिन में तीन बार से अधिक सेल्फ़ी लेना और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करना एक मनोरोग है. जिसे वैज्ञानिकों ने 'सेल्फि़टिस' नाम दिया है. आंकड़ों की मानें, तो 2014 से लेकर अब तक सिर्फ़ भारत में 76 लोगों की सेल्फी लेने के चक्कर में मौत हो चुकी है.

आश्चर्य की बात है कि लोगों के ऊपर सेल्फ़ी लेने का भूत इस कदर सवार है कि वो खतरनाक से खतरनाक जगहों पर भी सेल्फ़ी लेने से बाज़ नहीं आते और किसी बड़े हादसे का शिकार हो जाते हैं. ये अजीब ही है कि आज के ज़माने में बड़ी-बड़ी बीमारियों का इलाज हम इंसानों के पास है, हमारे पास विश्व की हर समस्या का समाधान है. मगर अफ़सोस कि महज एक सेल्फ़ी लोगों की ज़िंदगियों को लील रही है. आज सेल्फ़ी के कल्चर ने सबको मानसिक रोगी बना दिया है. सच कहूं, तो हमारे देश में सेल्फ़ी एक राष्ट्रीय रोग की तरह उभर रहा है, जिसके परिणाम अत्यंत चिंताजनक हैं.

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सेल्फ़ी से मौत के आंकड़े चौंकाने वाले हैं

दरअसल, सेल्फ़ी हमारे दौर का नया पापुलर कल्चर है. यह कल्चर मानव के लिए अभी तक घातक ही साबित हुआ है. अगर सेल्फ़ी की वजह से हुई मौत पर नज़र दौड़ाएं, तो जो आंकड़े सामने आते हैं, वो बेहद ही डरावने और हैरान करने वाले हैं. साल 2015 में नवी मुंबई में तीन छात्रों ने सेल्फ़ी के चक्कर में अपनी जान गंवा दी. तीनों अपने मित्र के जन्मदिन पर झील के किनारे गए थे. लेकिन बेहतर तस्वीर के चक्कर में गहरे पानी में चले गए और उनकी जान चली गई. जनवरी 2016 में आगरा के पास तीन छात्र रेल के नीचे आ गए. छात्रों की कोशिश थी कि ट्रेन के बैकग्राउंड में सेल्फी लें लेकिन ट्रेन बहुत पास आ गई और दुर्घटना हो गई.

पिछले साल जून में सात युवकों की गंगा बैराज में डूबने से मौत हो गई. घटना में जब एक लड़का सेल्फ़ी लेने के दौरान नदी में फिसला तो उसे बचाने के लिए छह लोग नदी में कूदे और सभी युवकों की डुबने से मौत हो गई. इसी तरह जुलाई में सेल्फ़ी के चक्कर में कोशी नदी में 12 छात्र बह गये, जिनमें से दो की मौत हो गई. ऐसे अनगिनत मामले हमें देखने को मिल जाएंगे, जिनमें मौत का जिम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ यह सेल्फ़ी कल्चर ही रहा है.

खतरनाक है ये सेल्फ़ियापा

सेल्फ़ी का क्रेज कितना अधिक है, इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि दुनिया में सेल्फ़ी से सबसे अधिक मौतें भारत में ही होती हैं. यही वजह है कि भारत आज 'सेल्फ़ी डेथ कंट्री' में शुमार होता है. युवाओं में ख़तरनाक और एडवेंचर्स सेल्फ़ी लेने और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने की इतनी तलब होती है कि यह एक लापरवाही में तबदील हो जाती है और वे खुद अपने हाथों अपनी बली दे बैठते हैं. सेल्फ़ी का आतंक इस कदर बढ़ रहा है कि जनवरी 2016 में सेल्फी लेने के चक्कर में मुंबई में पुलिस ने 16 पिकनिक स्पॉट को 'नो सेल्फ़ी ज़ोन' घोषित कर दिया.

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'नो सेल्फ़ी ज़ोन' को संवैधानिक अधिकार के खिलाफ़ मानते हैं लोग

एक समय था, जब लोग ऐतिहासिक विरासतों, धरोहरों, प्राकृतिक नज़ारों मसलन, झील, समुद्री लहरें, पहाड़-पर्वतों को देखा करते थे, उन्हें महसूस किया करते थे और उस विशेष पल को जिया करते थे. वे उन नज़ारों को इस कदर अपने मन में कैद कर लेते थे कि उनकी यादें उन्हें ताउम्र रहती थीं. मगर आज कल्चर कुछ और है और लोग भी. इतनी मौत की ख़बरें आने के बावजूद भी लोग सेल्फ़ी संस्कृति को सही ठहरा रहे हैं. अगर सरकार लोगों की सुरक्षा के मद्देनज़र अगर किसी जगह को नो सेल्फ़ी जोन घोषित कर भी देती है, तो लोग उसे स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ़ समझने लगते हैं.

ताज़ा मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी का है, डीयू के मिरांडा हाउस कॉलेज ने स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग की छात्राओं के लिए कैंपस में सेल्फ़ी लेने पर रोक लगा दिया है. हालांकि, इस मामले पर कॉलेज प्रशासन का कहना है कि उन्होंने ये फै़सला सेल्फ़ी के दौरान होने वाले हादसों को ध्यान में रखकर किया है, जिससे किसी की जान जोखिम में न पड़े. साथ ही इस एतिहासिक इमारत का संरक्षण भी किया जा सके. मगर कॉलेज की छात्राएं इस फै़सले के खिलाफ़ दिल्ली महिला आयोग जाने की तैयारी कर रही हैं.

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मानव जीवन के लिए घातक है सेल्फ़ी की संस्कृति

दुर्भाग्य की बात है कि सरकार और प्रशासन सेल्फ़ी के खतरे को भांपते हुए लोगों को सुरक्षा प्रदान करने की चेष्टा कर रहा है, तो वहीं कुछ लोग उनके कदम को संवैधानिक अधिकार के खिलाफ़ साबित करने की पूरज़ोर कोशिश में लगे हैं. आखिर कब तक हम सेल्फ़ी से होने वाले मौत के आंकड़ों से दूर भागेंगे? आखिर कब तक स्वतंत्रता की आड़ में सेल्फ़ी को बतौर अधिकार साबित करते रहेंगे?

असल में सेल्फ़ी किसी विशेष याद को सहेजने के लिए ली जाती है. पर आजकल लोग हर पल को कैमरे में कैद कर लेना चाहते हैं. ऐसा करने से कई बार हम किसी क्षण का वस्ताविक आनंद लेने से भी वंचित रह जाते है. ध्यान रहे कि हर एक पल को कैमरे में कैद नहीं किया जा सकता. इसलिए हर वक़्त कैमरा पकड़कर दौड़ने से बेहतर है कि उस क्षण का वास्तविक आनंद लिया जाये. क्योंकि हम और आप जिस संस्कृति को अपना रहे हैं, उसकी अति हमारे लिए हानिकारक साबित हो रही है.

अब आपको ये तय करना है कि आपके लिए एक सेल्फ़ी ज़्यादा महत्वपूर्ण है या फिर आपकी ज़िंदगी.

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