आज जहां समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा ख़त्म होती जा रही है, वहां एक नया ट्रेंड उभर कर आ रहा है. अकेले बुज़ुर्ग अब पैसे देकर उनके साथ समय बिताने के लिए लोगों को बुला सकते हैं. भारत में अब तक ये सुविधा चलन में नहीं थी, पर अब इसकी मांग बढ़ती जा रही है.

पैसे देकर आप पा सकते हैं बुढ़ापे के साथी

दिल्ली, गुड़गांव, मुंबई, पुणे और अहमदाबाद में Aaji Care जैसी कम्पनियां ये सुविधा दे रही हैं. इन कंपनियों की मदद से आप Sign-Up करने के बाद, समय-समय पर Volunteer उनसे मिलने आते-रहते हैं और उनके साथ अच्छा समय बिताते हैं. ये Volunteers उन्हें कंपनी देते हैं और उनके साथ डॉक्टर के पास, बैंक, शॉपिंग और अन्य जगहों पर भी जाते हैं. वो उनके साथ गेम्स खेलते हैं, उन्हें किताबें पढ़ कर सुनाते हैं और हर वो काम करते हैं, जिससे उनका समय अच्छे से बीते.

सुभद्रा के एक पैर में फ्रैक्चर है और उनका दिल भी कमज़ोर है, इसकी वजह से वो चल-फिर पाने में असमर्थ हैं. ऐसे में वो अपने परिवार के साथ कहीं भी बाहर नहीं जा पाती थीं, लेकिन अब वो 'The Family Member' से जुड़ चुकी हैं, अब उन्हें कभी घर में अकेले नहीं रहना पड़ता.

Volunteers की होती है पुलिस वेरिफ़िकेशन

45 वर्षीय भावेश एक IT कर्मचारी हैं. वो बताते हैं कि शुरू-शुरू में उन्हें किसी अजनबी को अपने घर में दाखिल होने देना बेहद अजीब लगा था, पर उन्होंने देखा कि Volunteers बेहद प्रोफ़ेशनल हैं. यही नहीं, उनके बारे में सभी डिटेल्स और पुलिस वेरिफ़िकेशन सर्टिफ़िकेट भी उन्हें पहले ही भेज दिया जाता है. इसके बाद उनका डर ख़त्म हो गया.

सुभद्रा अब इन Volunteers के साथ टीवी पर सीरियल देखती हैं, उनसे बाते करती हैं और उनके साथ आती-जाती हैं. पहले उन्हें भी किसी को साथ में रखने के लिए पैसे देने का आईडिया अजीब लगा था, पर अब उन्हें ये Volunteers अपने बच्चों की तरह लगने लगे हैं.

बढ़ रहा है सीनियर केयर का मार्केट

ये सुविधा 150 रुपये प्रति डेढ़ घंटा या 20,000 रुपये महीने पर ली जा सकती है. 'The Family Member' के संस्थापक; पियूष वायेदा बताते हैं कि केवल एक साल में उनके 25 क्लाइंट और 8 Volunteer बन चुके हैं. ये एक बड़ी सफ़लता है कि इसकी मांग अब बढ़ती जा रही है.
मुंबई के Aaji Care के संस्थापक प्रसाद भिड़े ने इसकी शुरुआत 2012 में की थी. वो बताते हैं कि हर महीने उन्हें नए क्लाइंट मिल रहे हैं. अब वो अपनी एक ब्रांच पुणे में भी खोलने जा रहे हैं.

अपने परिवार का तो कोई विकल्प नहीं हो सकता, पर बुज़ुर्गों का अकेलेपन को दूर करने के लिए ये सुविधा बहुत कारगर साबित हो रही है.

Volunteers को भी मिलती है ख़ुशी

20 वर्षीय नूतन एक Volunteer है, जो हर दोपहर चार घंटे एक 80 वर्षीय महिला के साथ बिताती है. वो बताती है कि ये कर के उसे भी बेहद अच्छा लगता है, क्योंकि उसका परिवार शहर में नहीं रहता और पाटिल के साथ समय बिता कर उसे उनकी कमी नहीं खलती. दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश रहती हैं. उसे इसके लिए महीने के 4,000 रुपये मिलते हैं, पर ये वो पैसों के लिए नहीं करती. उन्हें ये काम इतना पसंद है कि कई बार वो इसके लिए अपने प्लान्स भी कैंसिल कर देती हैं. उन्हें अपनी क्लाइंट से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

पुणे की 74 वर्षीय प्रोफ़ेसर सुधाकर को अपनी आंखों की रौशनी खोए तीस साल हो चुके हैं. वो अपने घर में अकेले रहते थे. जब से उन्होंने Maya Care से सर्विस लेना शुरू किया है, तब से हफ़्ते में पांच दिन Volunteer उन्हें कंपनी देने आते हैं. वो उन्हें अख़बार और किताबें पढ़ कर सुनाते हैं और उनके साथ समय बिताते हैं. वो एक ट्रेन्ड गायक हैं, Volunteers उन्हें गाते हुए सुनना बहुत पसंद करते हैं.

वो कहते हैं कि आज किसी रिश्तेदार के पास अपनों के लिए समय नहीं होता, सब अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते हैं. इसलिए उनसे मदद की आशा रखने का कोई फ़ायदा नहीं होता. ऐसे में ये सुविधा उनके जीवन में बड़ा बदलाव लायी है.

कैसा होता है सीनियर केयर Volunteer बनना?

विकास गंभीर जब तीस साल के थे, तब उन्होंने अपनी मां को खो दिया था. उनका कहना है कि कोई परिवार की कमी तो पूरी नहीं कर सकता, पर किसी बड़े के साथ समय बिता कर उन्हें भी अच्छा लगता है. इससे उन्हें भावनात्मक संतुष्टि मिलती है.

Source: Hindustantimes