देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर हुई शर्मसार, एक नाबालिग बनी रेप की शिकार...

महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित बन गयी है दिल्ली
सरकार कुछ करती क्यों नहीं है?

ऐसी कितनी 'संवेदनशील' हेडलाइंस आप और हम रोज़ पढ़ते हैं और रोज़ पन्ने पलट कर, चैनल चेंज कर के आगे बढ़ जाते हैं. कुछ जागरूक नागरिक सरकार को इसके लिए भर-भर कर गालियां देते हैं और फिर अपनी कॉफ़ी का कप पकड़ कर चेक करते हैं कि उनकी इस पोस्ट पर कितने Likes आये.

शायद इसीलिए 7 साल की ये बच्ची अपने बलात्कारियों को सज़ा दिलवाने के लिए किसी 'सिस्टम' या 'सरकार' का इंतज़ार नहीं कर रही, क्योंकि उसे हम में से किसी पर कोई विश्वास नहीं है.

21 अगस्त 2016 को पूर्वी दिल्ली के पास झुग्गियों में सो रही एक 7 साल की बच्ची को उसके घर के बाहर से कुछ लोग उठा कर एक जंगल में ले गए, उसका गैंगरेप हुआ और 22 अगस्त को TOI में इसकी खबर आई.

हैरानी की बात ये नहीं है कि दिल्ली में एक नाबालिग का इस तरह से रेप हुआ, (ये तो साहब इस शहर का पेशा है, इसलिए अब कहने में शर्म भी नहीं आती ). दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि एक 7 साल की बच्ची का गैंगरेप होता है और इस अपराध की FIR में आरोपियों का नाम तक नहीं लिखा जाता. निर्भया गैंगरेप के 3 साल बीत जाने के बाद भी पुलिस से लेकर लैब और कोर्ट के Procedures में कोई बदलाव नहीं आया है. सब कुछ जस का तस है, सिवाय दिल्ली में हर सेकेंड बढ़ती बलात्कार की घटनाओं के.

7 साल की उम्र क्या होती है?

एक बच्ची जिसका गैंगरेप हुआ हो, जिसे थाने में अपने बलात्कारियों की पहचान करने बुलाया जाता हो, उससे अजीब से सवाल पूछे जाते हों... क्या घात लगा होगा उसके दिमाग और मन पर? वो उस परिवार से ताल्लुक रखती है, जिसमें उसकी मां घर-घर जा कर काम करती है और पिता TB होने के बाद से काम नही कर पाता. क्योंकि ये समाज के गरीब तबके से ताल्लुक रखती है, इसलिए न तो उसकी FIR को गंभीरता से लिया गया, न ही उसका ढंग से परिक्षण हुआ.

ये वो देश है, जहां मंत्रियों का वेतन-भत्ता बढ़ाने के लिए कानून (और संशोधन) चुटकियों में पारित हो जाता है और बलात्कार के केस में क्या प्रोसीजर होने चाहिए, ये मूलभूत निर्देश जारी करने में एक चर्चित गैंगरेप होने का इंतज़ार किया जाता है.

'हम सरकार को ही कोसेंगे, तो शायद ये देश कभी आगे नहीं बढ़ेगा'

ये बात कही है उस इंसान ने, जो इस बच्ची को न्याय दिलवाने के लिए हर Saturday-Sunday गुड़गांव से पूर्वी दिल्ली जाता है.आनंद गुप्ता ने भी ये खबर टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ही पढ़ी थी, लेकिन हमारी तरह वो सिर्फ़ अफ़सोस कर नहीं बैठे. उन्होंने ज़िम्मा लिया इस बच्ची और समाज के इस तबके की आवाज़ बनने का.

उनसे जब ग़ज़बपोस्ट से बात की तो उन्होंने इस केस से इतर भी काफी सारी जानकारी साझा की.

वो बच्ची चुप है

उस बच्ची को पता है कि उसके साथ क्या हुआ है और इसका उस पर काफी गंभीर प्रभाव पड़ा है, शुरू में वो कुछ नहीं कहती थी, लेकिन बाद में वो थोड़ी बात करने लगी. उसकी मां सदमे में है कि उनकी बच्ची के साथ ही ऐसा क्यों हुआ, उसकी ज़िन्दगी खराब हो गयी, उसकी शादी कैसे होगी? पिता कुछ नहीं कहते.

कब तक सरकार को कोसेंगे

मतलब हम कब तक सरकार को कोसेंगे कि सरकार कुछ करेगी, नेता कुछ करेंगे? हम इतने भारतीय अगर अपनी ज़िन्दगी का एक दिन भी समाज की इन बुराईयों को ठीक करने की कोशिश में लगा दें, तो ये देश कैसे ठीक नहीं होगा.(उनकी आवाज़ में जोश है और आशा भी)

रेप को लेकर कानून तो है लेकिन उसका पालन नहीं

जितना हम सोच रहे हैं, उतना कुछ बदला नहीं है, बस कागजों पर कानून बने हैं. हालांकि ज़मीनी तौर पर सिचुएशन वैसी ही है. FIR करवाने के बाद लैब में गए सैंपल, कोर्ट की Proceedings, इसमें मूल-भूत कमियां हैं. पहले उनको सुधारना ज़रूरी है, जब तक उसमें बदलाव नहीं आएगा, तब तक किसी भी तरह के क्राइम में कोई कमी नहीं आएगी. जैसे अपने देश की लैब्स में जो रेप की कार्यवाही के दौरान सैंपल इकट्ठे किये जाते हैं, वो एक-एक साल पुराने होते हैं. केस सालों-सालों चलता है और उनमें वही सैंपल सबूत के तौर पर इस्तेमाल किये जाते हैं.

नए तरीके से सोचने की ज़रूरत है

महिलाओं पर हो रहे अपराधों में कानून की तरफ से भी जल्दी फैसले ना आने की वजह से कई बार अपराधी अपनी आधी ज़िन्दगी मौज में काट चुके होते हैं. मैं अपनी तरफ से जितनी कोशिश हो सके, करुंगा कि इसमें बदलाव आये. हमें इस समाज के हिसाब से कानून बनाने और अपराधियों पर कार्यवाही करने की ज़रूरत है. तब जाकर अगले 10 सालों में हम इन अपराधों से मुक्त भारत कहलाएंगे.

ग़ज़बपोस्ट आनंद गुप्ता के प्रयासों को सलाम करता है, अगर आप किसी तरह उनके प्रयास में हमराही बनना चाहें, तो उन्हें फेसबुक पर मैसेज कर सकते हैं.

ये है उनकी फेसबुक प्रोफाइल : Junior Anand Gupta

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