उसके चढ़ते ही सबकी नज़र उस पर पड़ी.

पर शायद उसे इसकी आदत सी हो गयी थी. वो अपनी खूबसूरती से अच्छी तरह वाकिफ़ थी.बैठने की जगह नहीं मिली, तो वो दरवाज़े के पास टेक लगा के खड़ी हो गई.यहां-वहां नज़र दौड़ाई तो देखा कि...

उसने सोचा, "धूप का चश्मा तो सर पर बड़े स्टाइल से लगा रखा है, देखने में भी ठीक-ठाक है. पर इसमें शर्म नाम की चीज़ नहीं. खुद बैठा हुआ है और मैं खड़ी हूं."

उसके लेडीज़ सीट पर बैठे रहने से ज़्यादा शायद उसे ये बात ज़्यादा बुरी लगी कि उस लड़के ने उसपर एक बार भी नज़र नहीं डाली. "उसकी इतनी हिम्मत? खैर छोड़ो, क्या फर्क पड़ता है." उसने अपने-आपको समझाया.

"अगला स्टेशन, गुरु द्रोणाचार्य" अनाउंसमेंट हुआ. उसका स्टेशन आ चुका था.

अभी भी उसे ये आशा थी, कि शायद वो उसकी तरफ़ देखेगा, मुस्कुराएगा, और वो उसे तिरछी निगाह से देख कर, मुंह फेर कर आगे बढ़ जाएगी.

उस लड़के का स्टेशन भी शायद यही था. वो खड़ा होने लगा, तब तक ट्रेन झटके से रुकी.उसका बैलेंस बिगड़ा और उसे उसके बगलवाले अंकल ने संभाला.

एक ही पल में जैसे उसका सपना शुरू होने से पहले ही टूट गया.

वो कुछ पल वही़ं पर सन्न सी खड़ी रही.एक नज़र जो वो उससे चाहती थी, उसे नहीं मिली.

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