'छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया', यह वाक्य ऐसे ही नहीं बना है, इसके पीछे कहानी है. कई लोगों की मेहनत है और कुछ लोगों की ईमानदारी भी. वो ईमानदारी, जिससे पूरा देश प्रेरित होता है. आइए, हम आपको छत्तीसगढ़ की धरा से एक ऐसी कहानी के बारे बताते हैं, जिसे जानकर आप गर्व महसूस करेंगे.

रात के करीब 10 बज रहे थे. एक स्टोरी के सिलसिले में मैं रायपुर के एक दंपति से मुलाक़ात करने गया था. उन दिनों मैं दैनिक भास्कर में नो-पॉलीथिन कैंपेन मुहिम पर काम कर रहा था. बात 2015 की शुरुआती महीने की है. मेरी मुलाक़ात शुभांगी आप्टे और उनके पति से हुई. दोनों से मिलकर अहसास हुआ मानो मैं एक असीम ऊर्जावान व्यक्तित्व से मिल रहा हूं. देखने में भले ही इनकी उम्र ज़्यादा लगे, मगर समाज के प्रति इनका समर्पण देख कर आप इनके जैसा ही बनना चाहेंगे.
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रायपुर में लोग इन्हें इनके नाम से नहीं, बल्कि काम से जानते हैं. इनका एक ही काम है, घर-घर जाकर लोगों से कतरन मांगना. शुरुआत में लोग इन्हें पागल और सनकी समझते थे, मगर बाद में लोगों को जब इनके मक़सद के बारे में पता चला, तो सब इनके साथ जुड़ गए. दरअसल, ये कतरन से थैले बनाते हैं और आस-पास के लोगों को देते हैं, ताकि लोग पॉलीथिन का इस्तेमाल ना करें.

Photo- Bikram Singh

ये एक पॉलीथिन मुक्त विश्व चाहते हैं. इसके लिए अपने स्तर पर काम कर रहे हैं.

पर्यावरण में फैल रही गंदगी और उससे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए शुभांगी अपने पति के साथ मिलकर शहर में प्लास्टिक केरी बैग से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को जागरूक कर रही हैं. इतना ही नहीं, ये शहर के हरेक कार्यक्रम में सिर्फ़ इसलिए शामिल होती हैं, ताकि लोगों को पॉलीथिन से होने वाले नुकसान के बारे में बता सकें. अपने साथ ये झोले भी रखती हैं और कार्यक्रम में मौजूद लोगों को देती हैं.

आस-पास के टेलर भी इनकी मदद करते हैं

शुभांगी के कार्य से प्रभावित होकर आस-पास के टेलर भी इनकी मुहिम में जुड़ गए. वे अपनी दुकान में बची कतरन इनको देते हैं और कई बार थैले सिल कर भी दे देते हैं.

महिला ब्रिगेड भी शामिल हो गईं

शुभांगी की मेहनत उस समय रंग लाई, जब शहर की महिलाएं शुभांगी के साथ जुड़ गईं. वे शुभांगी के साथ अलग-अलग मुहल्लों में जाती हैं, कपड़े लाती हैं और उनका थैला बनाती हैं.

समाजिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाकर थैले बांटती हैं

शहर में किसी भी तरह का सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या कोई समाजिक कार्यक्रम शुभांगी आप्टे अपने पति के साथ कपड़े बने थैलों को ज़रूर लेकर जाती हैं. कार्यक्रम में मौजूद सभी अतिथियों को अपने हाथ से बने थैले को देकर पर्यावरण की रक्षा करने को कहती हैं. अपनी सोच और लगन की वजह से आज पूरे शहर में इनके काम को सराहा जाता है.

शुभांगी आप्टे के अन्य शौक भी हैं

शुभांगी ने अपने घर पर कई प्रकार के कलेक्शन भी रखे हैं जिसकी वजह से इनका नाम 19 बार लिम्का बुक में दर्ज है. आइए देखते हैं और क्या-क्या शौक हैं शुभांगी के.

होटल के मेन्यू कार्ड जमा करती हैं

शायद ही आपने कहीं सुना होगा कि कोई होटल में जाकर वहां के मेन्यू कार्ड भी रखता हो. लेकिन शुभांगी आप्टे के पास भारत के लगभग सभी होटलों के मेन्यू कार्ड है, जिसमें होटल ताज और बेबीलॉन सरीखें होटल के मेन्यू कार्ड भी शामिल हैं.

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दुनिया की सबसे छोटी गीता शुभांगी के पास ही है

शुभांगी आप्टे के पास दुनिया का सबसे छोटी गीता है. शुभांगी ने इसे अपने पास सहेज कर रखा है. यह दुर्लभ धर्मग्रंथ शुभांगी को एक पुरानी दुकान से मिली थी. इसे पढ़ने के लिए मैग्नो ग्लास का इस्तेमाल किया जाता है.

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शुभांगी के शौक पर उनके पति कहते हैं कि जब से हमारी शादी हुई थी, मैंने इनको खुली छूट दे रखी है. इनके ये शौक मुझे अच्छे लगते हैं. सबसे अच्छी बात ये है कि इनकी मेहनत और लगन के कारण लोग मुझे इस शहर में पहचानते हैं.
अपनी इस शौक पर शुभांगी बताती हैं कि ज़िंदगी में हम अच्छी लाइफ़ जीने की जुगत में रहते हैं. इसके लिए हम मेहनत भी करते हैं, मगर ऐसा करके हम सिर्फ़ अपने बारे में सोच पाते हैं. हम जो कर रहे हैं, वो समाज के लिए है. हम अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य और स्वस्थ पर्यावरण देना चाहते हैं. इस मुहिम में मेरे पति का योगदान अतुल्यनीय है.

शुभांगी आप्टे एक सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, एक माता के रूप में काम कर रही हैं. 70 साल की उम्र होने के बावजूद वो इस देश के बारे में सोच रही हैं. पर्यावरण से विशेष लगाव होने के कारण उसे साफ़ रखना चाहती हैं. शायद इनकी सोच से हम प्रेरित हो सकें. पॉलीथिन का इस्तेमाल करना बंद कर दें.