महिलाएं किसी भी जाति से हों, उनको हमेशा-सा सामाजिक असंतुलन का शिकार होना पड़ा है. दक्षिण भारत के कई हिस्सों में नीची जाति के लोगों के साथ एक अजीब प्रथा का चलन था. चूंकि ऊंची जाति के रसूखदार लोगों की पहचान सिर से पैर तक ढके कपड़ों से होती थी, नीची जाति में एक ख़ास कास्ट के महिला-पुरुषों को अपने शरीर का उपरी हिस्सा ढकने का अधिकार नहीं था. इस नियम के हिसाब से, निम्न जाति की महिलाएं अपना तन नहीं ढक सकती थी और सालों तक उन्हें इस तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना को झेलना पड़ा.

दक्षिण ब्राह्मणों के अलावा नायर कम्युनिटी की महिलाओं को ये स्पेशल प्रिविलेज था, जिसके हिसाब से, उनसे नीची जाति की कोई भी महिला अपना तन नहीं ढक सकती. सालों तक ये अपमान झेलने के बाद 19वीं शताब्दी में छिड़े 'चन्नर रिवोल्ट', जिसे Maru Marakkal Samaram भी कहा गया, ने महिलाओं को उनका सम्मान वापस दिलवाया.

भारत की तरह ही श्रीलंका में भी Rodi या Rodiya जाति की महिलाओं के साथ ऐसी ही कप्रथा चल रही थी. श्रीलंका की सिंहली कम्युनिटी के लोगों को उत्त्तरी भारत और दक्षिण भारत के 'अछूत' वर्ग की तरह ही गांव से अलग रखा जाता था. सामाजिक स्तर पर इन्हें पूरी तरह से किनारे कर दिया गया था. इन्हें समाज के किसी और काम में हिस्सेदारी नहीं दी गयी, या तो भीख मांग कर, या फिर दूसरों के जूठन पर ही ये ज़िन्दा रहते थे.

Rodi जाति की महिलाओं को भी तन ढकने की इजाज़त नहीं थी. इनको तुच्छता से देखने के अलावा और किसी नज़र से नहीं देखा गया. लेकिन किसी फ़ोटोग्राफ़र ने इनकी परेशानियों से दूर इनके एक अलग रूप को दिखाने की कोशिश की.

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