'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,

किसी का दर्द ले सके तो ले उधार,

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,

जीना इसी का नाम है...'

ये लाइन्स जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही अर्थपूर्ण भी. इस पंक्तियों में जीवन का सार बताया गया है कि दूसरों की मदद करना, उनके चेहरे पर मुस्कान लाना और दूसरों के लिए दिल में प्यार हो, तो यही जीवन है.

आज की व्यस्त ज़िन्दगी में हमारे आपके पास जहां अपने लिए समय नहीं है, वहां दूसरों के लिए कहां से वक़्त निकलेगा. आज हम बस जिंदगी के पीछे भाग रहे हैं. आस-पास क्या हो रहा है ये तक हमको पता नहीं होता. मगर सच कहूं तो ये सिर्फ़ वो बातें हैं, जो हम इसलिए बोलते हैं क्योंकि हम किसी की मदद नहीं करना चाहते.

शायद आपको ये बात ग़लत लगे, पर ये सच है. क्योंकि हमारे ही आस-पास ऐसे लोग भी मौजूद है, जो सिर्फ़ अपने बारे में सोचने के अलावा बाकी सबके बारे में सोचते हैं. वो ऐसे लोगों के बारे में सोचते हैं, जिनको हमने बहुत पीछे कहीं छोड़ दिया है, जो मुख्य धारा से कट चुके हैं. जी हां, ऐसे ही लोगों में से एक हैं महाराष्ट्र के डॉक्टर प्रकाश आम्टे और उनकी पत्नी डॉक्टर मन्दाकिनी आम्टे. ये दोनों पिछले 45 सालों से माडिया गोंड नाम की आदिवासी प्रजाति के बीच रहकर उनकी सेवा कर रहे हैं.

इनके सराहनीय कामों के बारे में बात करने से पहले आपको बता दें कि प्रकाश आम्टे, डॉक्टर मुरलीधर देवीदास आम्टे जिनको लोग 'बाबा आम्टे' के नाम से भी जानते हैं, के बेटे हैं. बाबा आम्टे ने कुष्ठ रोगियों के लिए कई काम किए और उनके लिए आनंदवन की स्थापना भी की थी.

आइये जानते हैं प्रकाश आम्टे और मन्दाकिनी आम्टे के बारे में:

डॉ. प्रकाश आम्टे और डॉ. मन्दाकिनी आम्टे महाराष्ट्र के हेमलकसा नाम के आदिवासी इलाके में रहते हैं. ये दोनों महाराष्ट्र, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के लगभग एक हज़ार गांवों में रहने वाले मांडिया गोंड नाम के आदिवासी समुदाय के लाखों लोगों को सशक्त बनाने के लिए पिछले 45 सालों से काम कर रहे हैं.

प्रकाश आम्टे और और उनकी पत्नी के निःस्वार्थ भाव और हेमलकसा के लोगों के प्रति योगदान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस समुदाय के दुःख और तकलीफों को दूर करने के लिए इन जोड़े ने अपनी सुख-सुविधा, शिक्षा सब छोड़कर अपना जीवन समर्पित कर दिया.

एक समय था जब महाराष्ट्र स्थित सुदूर गांव हेमलकसा की माडिया जनजाति तरह-तरह की बीमारियों और तकलीफों को झेल रही थी और उन लोगों ने अपनी इस स्थिति को स्वीकार कर इसके साथ जीने की आदत डाल ली थी. ऐसे एक अनदेखे और अनजाने गांव की सेवा करने का निश्चय किया प्रकाश आम्टे ने और उनके इस निर्णय में उनकी भागीदार बानीं उनकी पत्नी मंदाकिनी आम्टे.

एक समय था जब इस गांव और यहां रहने वाले लोगों के लिए अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना सबसे बड़ा संघर्ष था, और तब इनके जीवन में मसीहा बनकर आयीं ये दोनों महान हस्तियां. आज इनके अथक प्रयासों से इस गांव और इसके आस-पास के गांव के लोग एक अच्छा जीवन व्यतीत कर है हैं. आज इनके पास शिक्षा केंद्र है, स्वास्थ्य केंद्र है. प्रकाश जी ने जंगली जानवरों के लिए एक एनिमल पार्क भी बनाया है, जहां अनाथ हो चुके छोटे जंगली जानवरों को रखा जाता है.

डॉ. आम्टे के अस्पताल में वो अपने परिवार के साथ रहते हैं. इस परिवार में सिर्फ़ उनके बच्चे ही नहीं रहते, बल्कि कई तरह के पशु और पक्षी भी रहते हैं. इन जानवरों में तेंदुआ, कोबरा, मगरमच्छ, हिरन, कुत्ते आदि शामिल हैं. डॉ. आम्टे के इस अस्पताल में प्रतिवर्ष करीब 40 हज़ार लोगों का इलाज़ किया जाता है. इसके अलावा यहां 600 बच्चों को निःशुल्क शिक्षा भी दी जाती है.

यहां के लोग प्रकाश आम्टे को बाबू कहकर बुलाते हैं. इन लोगों का कहना है कि ये लोग यहां आये और हमारी दुःख-तकलीफ़ों को समझा. इन्होंने हमारी जान बचाई वरना एक टाइम तो ऐसा था कि बीमारी की वजह से हर दिन यहां 20-25 लोग मर रहे थे. ऐसा लगने लगा था मानों हमारा समुदाय ख़त्म ही होने वाला था. हम सदैव इनके आभारी रहेंगे.

प्रकाश जी और उनकी पत्नी मंदाकिनी जी दोनों ही सर्टिफ़ाइड डॉक्टर्स हैं और सोशल एक्टिविस्ट हैं. एक डॉक्टर होने के नाते इन्होंने यहां के लोगों को इलाज की हर सुविधा दी, उनकी लिए अस्पताल खोला. साथ ही साथ यहां के बच्चों के लिए स्कूल भी खोला जहां बच्चे कंप्यूटर भी सीखते हैं और अंग्रेजी भी. प्रकाश जी और मंदाकिनी जी ने इन लोगों को वो दुनिया दी है जिसका इन्होंने सपना भी नहीं देखा था.

प्रकाश और मंदाकिनी दोनों का पूरा वक़्त अपने आश्रम में आदिवासियों के जीवन को सुधरने और उनको सशक्त बनाने के प्रयासों में बीतता है. इन दोनों को ही लोक बिरादरी प्रकल्प के लिए 'कम्युनिटी लीडरशिप कैटेगरी' में मैग्सेसे अवॉर्ड भी मिल चुका है. इसके अलावा इन दोनों को मदर टेरेसा जैसे कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. उनके सराहनीय कार्यों के लिए 2002 में प्रकाश आम्टे को पद्मश्री अवॉर्ड द‍िया गया था.

कहां से मिली इनको ये प्रेरणा

प्रकाश आम्टे के पिता बाबा आम्टे भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और वो विनोवा भावे के सहयोगी भी रह चुके थे. बाबा आम्टे ने भी अपनी पूरी ज़िन्दगी समाज सेवा ख़ासतौर पर कोढ़ियों की सेवा करने में बिताई थी. आज उन्हीं के नक़्शे कदम पर चलते हुए उनके बच्चे विकास और प्रकाश आम्टे भी असहाय और मजबूर-ज़रूरतमंदों की सेवा में आगे बढ़ रहे हैं. प्रकाश आम्टे ने बताया, 'जब हमारी मेडिकल की फ़ाइनल परीक्षा हो गई थी और रेज़ल्ट आने में टाइम था, तो विकास और मैं छुट्टियों में आनंदवन आ गए थे.

तब एक दिन बाबा ने पिकनिक पर दण्डकारण्य जंगलों में जाने का प्लान बनाया. करीब ढाई दिनों में तो हम वहां पहुंचे क्योंकि न ही वहां कोई पोल्ल था और न ही कोई रास्ता. जंगल में रहने वाली जनजाति की स्थिति दयनीय थी. न उनके पास खाने को कुछ था और न ही पहनने को कपड़े. उनकी ग़रीबी, शोषण और निरक्षरता को देखकर हम सब परेशान हो गए, तब बाबा ने इन आदिवासियों के उत्थान के लिए एक प्रोजेक्ट की शुरुआत करने का फैसला किया और मैंने उनका साथ देने का संकल्प. और यहीं से मेरी ज़िन्दगी का वो पड़ाव शुरू हुआ, जब मैंने इनको मुख्यधारा से जोड़ने का फ़ैसला किया.

कैसे बनी उनकी ये जोड़ी?

इसके साथ ही प्रकाश जी ने अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में बताया कि उन्होंने मंदाकिनी से प्रेम विवाह किया है. मंदाकिनी उनसे दो साल बड़ी हैं. प्रकाश और मंदाकिनी के तीन बच्चे हैं. प्रकाश ने बताया कि मैंने शादी से पहले ही मंदाकिनी जी को बता दिया था कि मैं जीवनभर आदिवास‍ियों के बीच जंगल में रहकर उनकी सेवा करना चाहता हूं. यदि उनको ये जीवन मंज़ूर है तो ही मुझसे शादी करना. जिसके बाद मंदाकिनी ने ख़ुशी-ख़ुशी मुझसे शादी करने के लिए हामी भर दी.

वहीं प्रकाश जी कहते हैं कि जब जंगल में हमने लोगों को सर्दी में बिना कपड़ों के देखा तो मैंने भी कपड़े त्याग दिए. और मेरी पत्नी ने मेरा साथ निभाते हुए सर्दी में कभी कम्बल या स्वेटर का इस्तेमाल नहीं किया. मैं अपनी पत्नी को अपनी प्रेरणा मानता हूं. मेरी पत्नी ने कभी मुझसे कोई शिकायत नहीं की जैसे हाल रहे वो हमेशा मेरे साथ खड़ी रही. मैंने कभी भी उनको एक साड़ी खरीद कर नहीं दी. पर उसके माथे पर कोई शिकन तक नहीं आई. मेरे लिए दुनिया की सबसे आदर्श महिला हैं डॉक्टर मंदाकिनी आम्टे.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि डॉ. आम्टे ने अपनी पत्नी के साथ एक पेड़ के नीचे से अपनी इस मुहीम की शुरुआत की थी. शुरू में जब वो इन इलाकों में जाते थे, तब ये आदिवासी डर के कारण अपने घरों में छुप जाते थे. लेकिन धीरे-धीरे उन लोगों का डर ख़त्म हो गया. आज उनकी मुहीम एक संस्था बन चुकी है.

ये पूरा आर्टिकल हाल ही में SONY टीवी के क्विज़ शो 'कौन बनेगा करोड़पति' की शुक्रवार को प्रसारित होने वाली सीरीज़ 'केबीसी कर्मवीर' में आये डॉ. प्रकाश आम्टे और डॉ. मंदाकिनी आम्टे की बातों पर आधारित हैं.

इस शो में इन्होंने 25 लाख रुपये जीते, जिन्हें वो चैरिटी के लिए दान करेंगे.