भाषा की गहराई को नापने का अगर कोई पैमाना होता, तो वो साहित्य ही हो सकता है. चाहे वो हिन्दी हो, अंग्रेज़ी हो, उर्दू हो या फिर विश्व की कोई और भाषा. साहित्य किसी भी भाषा का श्रृंगार है और अगर बात हिन्दी साहित्य की जाए, तो हिन्दी साहित्य की ख़ूबसूरती का कोई मानिंद नहीं.

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तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,

तू न मुड़ेगा कभी,

कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ...

ओजपूर्ण ये पंक्तियां निकली हैं एक ऐसी शख़्सियत की कलम से, जो हम सभी के ज़ेहन में हैं. चाहे आप साहित्य प्रेमी हों या न हों, मगर 'मधुशाला' आपने पढ़ी होगी, न भी पढ़ी हो तो इस बात की पूरी गारंटी है कि आपने सुनी ही होगी. वो कलमधारी हैं, हरिवंश राय बच्चन, उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक.

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हिन्दी साहित्य के मणि हरिवंश राय बच्चन के जीवन से जुड़ी कुछ सुनी-असुनी बातें:

1. श्रीवास्तव से कैसे बने बच्चन

27 नवंबर, 1907 को एक आम कायस्थ परिवार मेंं जन्मे हरिवंश राय के परिवार का उपनाम था श्रीवास्तव लेकिन प्यार से सभी हरिवंश को 'बच्चन' बुलाते थे. W.B.Yeats पर शोध करने जब वो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए, तब वहां उन्होंने 'बच्चन' को अपना उपनाम बना लिया.

2. कैंब्रिज से डॉक्टरेट पाने वाले दूसरे भारतीय

हिन्दी में कविताएं करने वाले बच्चन साहब, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाते थे. कैंब्रिज से अंग्रेज़ी साहित्य में डॉक्टरेट पाने वाले वे दूसरे भारतीय थे.

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3. सिर्फ़ 28 साल की उम्र में लिखी मधुशाला

एक ऐसा कवि जिसने मदिरा की एक बूंद तक नहीं चखी और 'मधुशाला' जैसी कविता लिख डाली. हरिवंश राय बच्चन ने ख़य्याम की 'रुबाइयत' से प्रेरित होकर मात्र 28 वर्ष की आयु में इस कविता की रचना कर दी थी. कई भाषाओं में अनुवादित, कई बार मंचित होने के बाद भी ये कविता दूब पर गिरी ओस की बूंद की तरह नवीन लगती है.

4. 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती', ये कविता बच्चन साहब ने नहीं लिखी

जिस तरह ग़ालिब के नाम से कुछ ऐसे शेर भी मशहूर हो गए हैं जो उन्होंने नहीं लिखी हैं, कुछ ऐसा ही हरिवंश राय बच्चन के साथ भी हुआ है.

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

बहुत से लोग इन पंक्तियों को बच्चन साहब की कृति मानते हैं लेकिन ये पंक्तियां पद्म श्री 'सोहम लाल द्विवेदी' जी ने लिखी हैं.

अमिताभ बच्चन ने भी एक फ़ेसबुक पोस्ट के ज़रिए इस बात की पुष्टि की थी.

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5. इंदिरा गांधी की मृत्यु पर लिखी थी आख़िरी कविता

31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी. उनकी मृत्यु पर बच्चन साहब ने अपनी आख़िरी कविता 'एक नवंबर 1984' लिखी थी

हिन्दी साहित्य के जगमगाते सितारे, बच्चन साहब की कविताएं हमें ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी हिन्दी साहित्य को पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी.