रानी रामपाल! इस नाम से शायद ही कोई वाकिफ़ होगा? जिन्हें नहीं मालूम उन्हें बता दें कि रानी रामपाल भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान हैं. क्रिकेट में जो मुकाम आज विराट कोहली का है वही मुकाम हॉकी में रानी रामपाल भी रखती हैं.

रानी रामपाल हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के शाहाबाद मारकंडा से हैं. रानी ने 6 साल की उम्र से ही हॉकी खेलना शुरू कर दिया था. 14 साल की उम्र में वो भारतीय महिला सीनियर हॉकी टीम में चुनी गईं. आज वो भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान के तौर पर विश्व भर में अपनी पहचान बना चुकी हैं.

बेहद कठिन रहा रानी का संघर्ष

इस मुकाम तक पहुंचने में रानी रामपाल का सफ़र बेहद कठिन रहा. वो बहुत ही साधारण परिवार से आती हैं. परिवार का पेट पालने के लिए पिता तांगा चलाकर ईंटें बेचा करते थे. पिता की आमदनी 5 लोगों के परिवार के लिए बेहद कम थी. रहने को पक्का घर भी नहीं था. बारिश के दिनों में कच्चे घर में पानी भर जाता था. इन्हीं विपरीत परिस्तिथियों से लड़कर रानी ने भारतीय टीम तक का सफ़र तय किया.

'द बेटर इंडिया' से बातचीत में रानी ने कहा कि 'मुझे हमेशा से पता था कि मुझे हॉकी खेलना है. लेकिन मेरे पिता के पास पैसे बिलकुल भी नहीं थे. मेरे पिता के पास मेरे लिए अकेडमी में ट्रेनिंग दिलाने, हॉकी किट ख़रीदने और जूते ख़रीदने तक के पैसे भी नहीं हुआ करते थे. कई बार तो मैंने नंगे पैर ही ट्रेनिंग की.

'मैं ऐसी जगह पर पली-बढ़ी हूं, जहां आज भी महिलाओं और लड़कियों को घर की चारदीवारी में रखा जाता है. जब मैंने हॉकी खेलने की इच्छा ज़ाहिर की, तो मेरे माता-पिता और रिश्तेदारों ने साफ़ तौर पर इंकार कर दिया था. मेरे माता-पिता बहुत छोटी जगह से हैं और ज़्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं. उन्हें लगता था कि स्पोर्ट्स में करियर नहीं बन सकता और लड़कियों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं.
'मुझे हर हाल में हॉकी खेलना था, लेकिन माता-पिता मानने को तैयार नहीं थे. मुझे आज भी याद है कई बार मानने के बावजूद जब वो नहीं माने तो मैंने आख़िरी बार उनसे कहा कि, आप मुझे बस एक मौका दे दो और एक बार मुझे खेलते हुए देख लो. अगर आपको लगे कि मैं कुछ ग़लत कर रही हूं, तो मैं हॉकी खेलना छोड़ दूंगी'
जब मैंने हॉकी खेलना शुरू किया तो हमारे रिश्तेदार मेरे पिता को ताने देते थे, ‘ये हॉकी खेल कर क्या करेगी? बस छोटी-छोटी स्कर्ट पहन कर मैदान में दौड़ेगी और घर की इज्ज़त ख़राब करेगी'. आज वही लोग पीठ थपथपाते हैं और घर लौटने पर ख़ासतौर से बधाई देने आते हैं.

भारतीय हॉकी टीम में चयन बिल्कुल भी आसान नहीं था. इसके लिए मैंने दिन रात एक किया है. मैं कई घंटो तक लगातार ट्रेनिंग किया करती थी, एक दिन भी ट्रेनिंग नहीं छोड़ती. मेरे कोच बलदेव सिंह ने मुझे अनुशासन के साथ हॉकी खेलना सिखाया. आज मैं जो कुछ भी उन्हीं की बदौलत हूं.

पांच साल पहले तक जिस भारतीय हॉकी टीम को वर्ल्ड लेवल पर एक कमज़ोर टीम कहा जाता था. पिछले कुछ सालों में उसी भारतीय टीम ने स्पेन, आयरलैंड और स्पेन जैसी मज़बूत टीमों को धूल चटाई है.

भारतीय महिला हॉकी टीम ने साल 1980 के बाद पूरे 36 साल बाद रानी की बदौलत ही साल 2016 के समर ओलिंपिक के लिए क्वालीफ़ाई किया था. इस दौरान रानी ने विजयी गोल लगाकर भारत को ओलंपिक का टिकट दिलाया था.

इसी साल अगस्त में जापान की राजधानी टोक्यो में आयोजित 'ओलंपिक टेस्‍ट इवेंट' के दौरान रानी की कप्तानी में भारतीय टीम ने फ़ाइनल में जापान को 2-1 से हराकर जीत हासिल की थी. रानी रामपाल की कप्तानी में भारतीय हॉकी टीम ने साल 2018 के एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल जीता था. राष्ट्रमंडल खेलों में भारत चौथे स्थान पर रहा जबकि लंदन में हुए विश्व कप में भारतीय टीम 8वें स्थान पर रही.

क्या हैं रानी की उपलब्धियां?

साल 2009, रूस में आयोजित 'चैंपियन चैलेंज टूर्नामेंट' के दौरान रानी ने फ़ाइनल मैच में 4 गोल दागकर ‘द टॉप गोल स्कोरर’ और ‘यंग प्लेयर ऑफ़ टूर्नामेंट’ का ख़िताब जीता था. जबकि साल 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में वो एफ़आईएच के ‘यंग वुमन प्लेयर ऑफ़ द इयर’ अवॉर्ड के लिए भी नामांकित हुई थीं.

साल 2010, ग्वांगझु में हुए 'एशियाई खेलो' में बेहतरीन प्रदर्शन के चलते उन्हें ‘एशियाई हॉकी महासंघ’ की ‘ऑल स्टार टीम’ का हिस्सा बनाया गया. अर्जेंटीना में आयोजित 'महिला हॉकी विश्व कप' में उन्होंने 7 गोल करके भारत को शून्य से विश्व महिला हॉकी रैंकिंग में 7वें पायदान तक पहुंचाया.

साल 2013 के 'जूनियर हॉकी विश्व कप' में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया. इस दौरान पहली बार भारत ने ब्रोंज़ मेडल जीता था. रानी ने इस दौरान ‘प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट’ का ख़िताब जीता था.

मेरे लिए भारतीय महिला हॉकी टीम का नेतृत्व करना सबसे बड़ा सम्मान है.