आज ही के दिन 21 साल पहले शारजाह में एक अति नाटकीय मैच खेला गया था. जिसमें मैच जीतने वाली टीम विजेता टीम के साथ फ़ाइनल में पहुंची. दर्शकों ने दो तरफ़ां तूफ़ान देखा. एक स्टेडियम के बाहर, एक स्टेडियम के भीतर. असल में क्या हुआ था, उसके लिए डीटेल में जाना पड़ेगा.

22 अप्रेल, 1998 के बीच शारजाह में भारत और अस्ट्रेलिया के बीच शारजाह कप का सेमी-फ़ाइनल खेला जा रहा था. पहले बैटिंग करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने 284 रनों का टारगेट खड़ा कर दिया, ये तब की बात है जब क्रिकेट में 300 रन यदा-कदा बना करते थे.

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रेगिस्तान में उठी आंधी की वजह से मैच आधे घंटे के लिए प्रभावित हुआ, इसलिए भारत को संशोधित लक्षय दिया गया, अब भारत को 46 ओवर में 276 रन बनाने थे.

यह तब का दौर था, जब सचिन के नाम के साथ महान बल्लेबाज़ का टैग नहीं जुड़ा था, फिर भी भारतीय टीम उनके कंधों पर ही निर्भर करती थी. मास्टर ब्लास्टर ने उस मैच में ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा.

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सेमी-फ़ाइनल में सचिन ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ पारी खेला, 131 गेंदों 143 रन बना कर मैच को एकतरफ़ा भारत के पक्ष में ला खड़ा कर दिया, भारत की ओर से दूसरा सर्वोच्च स्कोर नयन मोंगिया का था, उनके बल्ले से 35 रन निकले थे.

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वैसे तो भारत को मैच जीतने के लिए 276 रन बनाने थे लेकिन नेट रन रेट के हिसाब से फ़ाइनल में क्वालिफ़ाई करने के लिए उसे 237 रन बनाने थे. सचिन के 9 चौके, 5 छक्के की ताबड़तोड़ बल्लेबाज़ी से नेट रन रेट का मसला हल कर लिया गया था, बावजूद इसके सचिन मैच जीतने के लिए खेल रहे थे.

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सचिन जिस गति से रन बना रहे थे, भारत का मैच जीतना आसान लग रहा था. तब एक और घटना हुई जिसकी मिसाल बनती है, गेंदबाज़ फ़्लेमिंग के एक बाउंसर पर पुल शॉट खेलने के चक्कर में गेंद सचिन के बल्ले से लग कर गिलक्रिस्ट के दस्ताने में चली गई, ज़ोरदार अपील के बावजूद अंपायर ने अपनी उंगली नहीं उठाई लेकिन सचिन को मालूम था कि वो आउट हैं, इसलिए वो मन-सोस कर पवेलियन की ओर चल दिए, चाहते तो क्रीज़ पर रहकर भारत को जिताने की कोशिश करते और खुद का सर्वोच्च स्कोर को आगे बढ़ाते, लेकिन ऐसा करना उसूलों के ख़िलाफ़ होता.

दो दिनों बाद फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया और भारत फिर से आमने सामने थे, ऑस्ट्रिलिया ने 272 रन बनाए और भारत ने सचिन के 134 रनों के योगदान से 275. भारत शारजाह कप का विजेता बना.