सचिन तेंदुलकर! ये नाम सुनते ही हमें वर्ल्ड क्रिकेट के कभी न टूटने वाले रिकॉर्ड याद आने लगते हैं. 16 नवंबर, 2013 को 24 साल के बाद मैदान से सचिन... सचिन... वाली आवाज़ें हमेशा के लिए खामोश हो गई थीं. दरअसल, इस दिन क्रिकेट के भगवान सचिन ने अपने घरेलू मैदान वानखेड़े में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था.

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6 साल बीत जाने के बाद मैं आज भी मैदान पर सचिन के वो स्ट्रेट ड्राइव और स्वीप मिस करता हूं. जिन्हें देखने भर से मुझे उस वक़्त एक अलग ही सुकून मिलता था. मुझे आज भी सचिन का वो विदाई मैच अच्छे से याद है. भारत-वेस्टइंडीज़ के बीच खेले गए इस टेस्ट मैच के आख़िरी दिन मैं सुबह से ही टीवी के सामने धरने पर बैठ गया था. आंखों में आंसू थे और यकीन नहीं हो रहा था कि सचिन को आख़िरी बार मैदान पर देख रहा हूं.

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सचिन के आख़िरी टेस्ट मैच के उस विदाई समारोह का वीडियो फ़ैंस आज भी देखते हैं. पवेलियन की ओर लौटते वक़्त सचिन की आंखों में आंसू देख मेरे जैसे कई अन्य फ़ैंस की आंखों में भी आंसू थे.

19 नवंबर को 'इंटरनेशनल मेन्स डे' के मौके पर सचिन ने एक ऐसा पोस्ट लिखा है, जो हर किसी को ज़रूर पढ़ना चाहिए.

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'वर्तमान और भविष्य के पुरुषों' के नाम सचिन का ये पैगाम

सचिन लिखते हैं-

आप जल्द ही पिता और पति, भाई और दोस्त, मेंटर और शिक्षक बनने वाले होंगे. आप किसी के लिए उदाहरण बनने जा रहे हो. आप हिम्मती और मज़बूत बनेंगे. बहादुर और उदार भी बनेंगे. इस दौरान आप डर, दुविधा और मुश्किलों का भी सामना करेंगे. बेशक, आपके सामने एक वक्त ऐसा भी आएगा जब आप फ़ेल भी होंगे. उस वक़्त आपका रोते हुए सबकुछ छोड़ देने का मन भी करेगा.
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लेकिन मन में ये ख़याल भी ज़रूर आएगा कि अपने आंसुओं को रोककर मज़बूती से इसका सामना करूं. पुरुष ऐसा ही करते हैं. क्योंकि हमें ये महसूस कराया जाता है कि पुरुषों से रोने की उम्मीद नहीं की जाती. रोना पुरुष को कमजोर बनाता है. क्योंकि मैं ख़ुद इसपर विश्वास करते हुए बड़ा हुआ. मैं आज ये सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मुझे अहसास हुआ है कि मैं उस वक़्त ग़लत था. दरअसल, मेरे संघर्ष और मेरे दर्द ने ही मुझे एक बेहतर इंसान बनाया है.
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16 नवंबर, 2013. मैं आज भी उस दिन को याद करता हूं. इस दौरान मैंने काफ़ी देर तक ख़ुद को संभालने की कोशिश कि लेकिन पैवेलियन लौटते वक़्त मैं ख़ुद को संभाल नहीं पाया. पैवेलियन की तरफ़ बढ़ता मेरा हर एक कदम मुझे दर्द दे रहा था. उस वक़्त मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे सब कुछ ख़त्म हो रहा हो. इस दौरान मेरे दिमाग़ में बहुत सारी चीज़ें चल रहा थीं. मैं खुद पर काबू ही नहीं कर पा रहा था.
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इस दौरान मैंने अपने उस दर्द को दुनिया के सामने जाने दिया. जिससे मुझे एक अलग तरह की शांति मिली. ये मेरे लिए आश्चर्यजनक था, लेकिन इससे मुझे उस दर्द को सहन करने की ऊर्जा मिली. फिर मैंने जो कुछ भी हासिल किया, उसके लिए शुक्रिया कहा. तब मुझे पुरुष होने का अहसास मिला.

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जहां तक मेरा मानना है रोने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए. जो चीज आपको अंदर से मजबूत बनाती है, उसे दुनिया को दिखाने में किस बात की शर्म? अपने आंसुओं को क्यों छिपाया जाए? अपने दर्द को जाहिर करने के लिए हिम्मत चाहिए होती है.

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इसलिए आप हमेशा इस बात के प्रति आश्वस्त रहें कि आप नई सुबह की तरह बेहतर और मज़बूत बनकर निकलेंगे. बस मैं आपको सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगा कि आप इस भ्रम को तोड़िए कि पुरुष क्या कर सकते हैं और क्या नहीं. आप जो कोई भी हों, जहां कहीं हों, मैं आपको ये हिम्मत हासिल करने की शुभकामना देता हूं.

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सचिन का ये पोस्ट पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि जो लोग ये कहते फिरते हैं कि 'मर्द को दर्द नहीं होता' वो सब एक ढकोसला है. मर्द को दर्द भी होता है और मर्द रोता भी है क्योंकि रोने से इंसान कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत बनता है.