फ़िलहाल सोशल मीडिया का दौर है, पाकिस्तान की टीम कमज़ोर है लेकिन जब ये अपने स्वर्णिम दौर में थी, तब भारत-पाकिस्तान मैच युद्ध स्तर पर खेली जाती थी और लड़ाई भी टक्कर की होती थी. टीवी तब भी तोड़े जाते थे लेकिन वो आक्रोश में टूटते थे, इंस्टाग्राम पर वायरल होने की चाहत और सुर्खियों में आने की तमन्ना में नहीं.

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उसी दौर में जनवरी, 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक मैच खेला गया था. मैच काफ़ी दिलचस्प था लेकिन उससे भी दिलचस्प था उस मैच से जुड़ा एक वाकया.

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उसी दौर में जनवरी, 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक मैच खेला गया था. मैच काफ़ी दिलचस्प था लेकिन उससे भी दिलचस्प था उस मैच से जुड़ा एक वाकया.

पाकिस्तान 12 साल बाद भारत मैच खेलने आई थी, कई गुट मैच को प्रभावित करने की धमकी दे रहे थे. 2 मैचों के सीरीज़ पर ख़तरे के बादल मंडरा रहे थे. फिर भी मैच खेला गया.

अपनी पहली पारी में पाकिस्तान ने 238 रन बनाए, इस छोटे से स्कोर पर भारत सिर्फ़ 16 रनों का लीड ले सका और उसने 254 रन बनाए.

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दूसरी पारी में पाकिस्तान की शुरुआत बेहतरीन रही. पाकिस्तान की टीम 5 विकेट पर 275 रन बना कर खेल रही थी. शाहिद अफ़रीदी शतक बना कर पिच पर मौजूद थे, टीम बड़े स्कोर की ओर बढ़ रही थी. तभी तेज़ गेंदबाज़ वैंकटेश प्रसाद का जादू चला और पाकिस्तान की टीम 286 पर निपट गई.

भारत के सामने 270 का रनों का लक्ष्य था. पिछली इनिंग में राहुल द्रविड और सौरव गांगुली ने अच्छी पारी खेली थी, सचिन भी फ़ॉर्म में थे.

सचिन एक तरफ़ खड़े रहे और सामने के छोर से बल्लेबाज़ों का आना-जाना लगा रहा. अंत में सचिन को नयन मोंगिया का साथ मिला लेकिन सचिन बैक इंजरी से जूझ रहे थे. नयन मोंगिया का भी कोई भरोसा नहीं था कि कब आउट हो जाएं.

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दर्द से परेशान सचिन अपनी करियर की कई यादगार पारियों में से एक में 136 रन बना कर आउट हो गए. भारत के हाथ में अब भी चार विकेट थे लेकिन वो चार विकेट मिल कर सिर्फ़ चार रन बना सके. भारत की 12 रनों से हार हुई.

लेकिन हम तो मैच से अलग एक दूसरे वाकये की बात कर रहे थे, जो ज़्यादा दिलचस्प था.

जीत के बाद पाकिस्तानी टीम ने विनिंग लैप लेने मैदान में दौड़ लगानी शुरू की और उम्मीद के विपरीत, भारतीय दर्शक उनके सम्मान में खड़े हुए.

जहां भारतीय दर्शक गुस्से में बोतल फेंकने के लिए जाने जाते थे, वही दर्शक और किसी के लिए नहीं बल्कि पाकिस्तान के लिए खड़े हुए. इस कदम से पाकिस्तान टीम भी गद-गद हो गई.

तब दो देशों से अलग लोगों ने खेल का सराहा था और एक बेहतरीन मैच और उसके सम्मान में खड़े हुए थे. आज ऐसा नज़ारा नामुमकिन सा लगता है.