Oxford University के मशहूर प्रोफ़ेसर Dr. Paul Kelley ने हाल ही में पता लगाया है कि आधुनिक युग में टॉर्चर का सबसे कॉमन जरिया है सुबह में उठने के बाद 10 बजे से पहले ही काम शुरू कर देना. ये वो वजह है, जो हम सभी पर प्रभाव डालती है.

हमारा शरीर बॉयोलॉजिकल टाइमर पर काम करता है, जिसे Circadian Rhythm कहते हैं. ये हमारा बॉडी क्लॉक, जो जेनेटिकली पहले से ही प्रोग्राम किया गया है, जो ब्रेन की एक्टिविटी, एनर्जी लेवल, हॉर्मोन प्रोडक्शन और समय की अवधारणा को रेगुलेट करता है. जब हम सुबह 10 बजे से पहले ही काम करना शुरू कर देते हैं, तो हम वैज्ञानिक रूप से अपने शरीर को टॉर्चर करते हैं, इसलिए हमारा शरीर और स्वास्थ्य बैलेंस में नहीं रह पाता.

Kelley के अनुसार,

'हम अपना 24 घंटे का तारतम्य नहीं बदल सकते. आप हमेशा एक ही निश्चित समय पर नहीं उठ सकते... आपका लीवर और ह्रदय दोनों अलग-अलग पैटर्न पर चलते हैं और आप उनसे 2 से तीन घंटे का बदलाव करने को कहते हैं.'

ये कैसे होता है?

20वीं सदी में शुरू हुआ आठ घंटे तक काम करने का चलन हफ्ते में सातों दिन फैक्ट्री में काम करने के हिसाब से डिज़ाइन किया गया था, न कि नैचुरल इंसानी शरीर के क्लॉक के अनुसार. हालांकि पहले के ज़माने में हमारा शरीर सूरज की रौशनी से घिरे रहकर काम करता था, तब इस समय की तरह बिजनेस और कॉमर्स की स्ट्रेटजी नहीं थी.

British Science Festival बोलते हुए Dr Paul Kelley ने कहा,

'हमारे पास एक नींद से वंचित समाज है और ये एक वैश्विक मुद्दा है. हर कोई इससे जूझ रहा है, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.'

उनका विचार था कि ब्रिटेन में स्कूल का टाइम 8.30 am to 10.00 को आगे बढ़ाया जाए. एक चुने गए स्कूल पर अपनी थ्योरी का टेस्ट करते हुए कुछ समय के बाद एग्ज़ाम आने के बाद, उन्हें ये देखकर अचरज नहीं हुआ कि अटेंडेंस लेवल में काफी सुधार आया और पूरे स्कूल की प्रोडक्टिविटी बढ़ी है. सबसे महत्वपूर्ण ये था कि स्टूडेंट्स के ग्रेड भी बहुत तेजी से सुधरे.

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यदि हम इस आइडिया को समाज के दूसरे हिस्सों में अप्लाई करें, तो सोचिए कितना सुधार होगा. बुरी तरह थके, काम से पस्त, कॉफी की लत में काम करते लोगों के बजाय, करेंगे तो हमें नैचुरली ज़्यादा प्रोडक्टिव और बिना किसी लत के काम करने वाले फोकस्ड और खुश लोग मिलेंगे.

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जो कंपनियां जो अपने एम्प्लॉयीज को सुबह 10 बजे से पहले काम शुरू करने को फ़ोर्स करती हैं, वे अपने लोगों को सीरियस भावनात्मक और शारीरिक तनाव महसूस करवा रही हैं. इससे उन्हें हेल्थ रिस्क भी ज़्यादा होता है. इससे वे कठोर और अन्हेल्दी कम करने के आदती हो जाते हैं. ये तरीके बहुत बड़ी वजह हो सकते हैं कि अमेरिका में लोग हर दिन कम से कम 3 कप कॉफ़ी पीते हैं, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा काम में अलर्ट रह सकें. यानि 40 बिलियन डॉलर हर साल, वो भी सिर्फ़ कॉफ़ी पर खर्च होता है.

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