भले ही भारतीय रेलवे ट्रेन्स में पैसेंजर्स को अधिक से अधिक सुविधाएं देने में जुटा हो, लेकिन कुछ सुविधाओं ने उसका ही सिरदर्द बढ़ा दिया है. हम में से अधिकतर लोगों का ध्यान विरले ही ट्रेन के बाथरूम में रखे स्टील के मग पर जाता होगा. लेकिन जनाब यही स्टील का मग आज चर्चा का विषय बन गया है. ट्रेन के बाथरूम में लोगों की सुविधा के लिए स्टील मग लगाए गए हैं. मग को कोई चोरी करके न ले जाए, इसके लिए उसे लोहे की जंज़ीर से बांध कर रखा जाता है. मगर अफ़सोस चोर की नज़रों से वह मग भी नहीं बच सका.

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अगर हम आंकड़ों पर गौर करेंगे, तो पायेंगे कि भारतीय रेलवे की जितनी वस्तुओं की चोरी होती है, उसमें सबसे अधिक शौचालय में इस्तेमाल किया जाने वाला मग ही है.

पश्चिम सेंट्रल रेलवे के जबलपुर रेल मंडल ने पिछले तीन महीने में 450 कोचों में 1800 स्टील मग लगाए. इनमें से 1100 से अधिक मग चोरी हो गए. हैरान करने वाली बात ये है कि चोरी सिर्फ़ जनरल और स्लीपर कोच में ही नहीं हुई, बल्कि एसी कोच के बाथरूम से भी मग चोरी हुए हैं.

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गौरतलब है कि इससे पहले इस तरह के मग का इस्तेमाल सिर्फ़ एसी कोच में ही होता था. मगर हाल ही में रेलवे ने हर तरह के कोचेज़ में इसे लगाने का फ़ैसला लिया था. मगर शायद रेलवे अधिकारियों को भी नहीं पता होगा कि मग लगाने की ये सुविधा इतनी अधिक लोकप्रिय होगी कि लोग अपने साथ ही लेकर घर चल देंगे.

एक अधिकारी के मुताबिक, जबलपुर से दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सिर्फ़ 36 घंटे के भीतर 60 नए मग चोरी हो गये. खास बात ये है कि सभी मगों को जंज़ीर से बांध कर रखा गया था. सबसे ज़्यादा मगों की चोरी बीते तीन महिनों में हुई है.

वैसे तो ट्रेन से कंबल, पर्दे और बल्ब सहित कई सामानों की चोरी होने की बात सामने आई है, लेकिन इन सब में सबसे ज़्यादा पॉपुलर स्टील मग ही रहा है.

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गौरतलब है कि बाथरूम में लगने वाले स्टील के एक मग और चेन को खरीदने में रेलवे को तकरीबन 100 से 120 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं. अकेले एक मग की कीमत करीब 50 रुपये होती है.

हालांकि, इस चोरी से परेशान रेल अधिकारियों ने इसकी शिकायत आरपीएफ से भी की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला. लेकिन रेलवे इस चोरी की समस्या से निज़ात पाने के लिए कुछ बेहतर विकल्प पर काम कर रहा है.

बहरहाल, ऐसी घटिया हरकतें लोगों की छोटी सोच को उजागर करती हैं. हम ट्रेनों में मिलने वाली सुविधाओं की कमी के लिए आखिर कब तक सरकार को कोसते रहेंगे. क्या सरकारी संपत्ति हमारी संपत्ति नहीं होती, जिसकी हम रक्षा नहीं कर पाते? क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं कि हम रेलवे को कोसने के बदले, खुद सुधरने की कोशिश करें.

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