घंटों बिना हिले-डुले बैठना, आंखें भी बंद न करना, सर्दियों की ठिठुरन ऐसे न जाने कितने सवालों और कशमकश से हर रोज़ गुजरना पड़ता है एक न्यूड मॉडल को. वही न्यूड मॉडल जिसकी पेंटिंग्स की बोली, तो ऊंचे से ऊंचे दाम पर लगती है, लेकिन इतने सारे कष्ट झेलने के बावजूद उसे मेहनताने के रूप में महज 220 रुपये पकड़ा दिए जाते हैं. जी हां, आज एक ऐसी ही मॉडल की कहानी से रू-ब-रू , जिसके करवाएंगे हम आपको:

कहते हैं कि शर्म और हया एक औरत का गहना होती है, लेकिन इस न्यूड मॉडल को अपने इसी गहने को त्याग कर एक बंद कमरे में लोगों के सामने बिना कपड़ों के बैठना होता है. ऐसा करना किसी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन जब बात बच्चों के लिए पेटभर खाने का इंतज़ाम करने की हो, तो एक मजबूर मां आंसू के घूंट पीने को भी तैयार हो जाती है.

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हम जिस न्यूड मॉडल की बात कर रहे हैं उनका नाम कृष्णा है. ये करीब दो दशकों से कभी पेंटिंग, तो कभी स्कल्पचर के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी जा रही हैं. माथे पर बिंदिया व सिंदूर, हाथों में चूड़ियां... वो एक आम महिला की तरह ही दिखाई देती हैं. उन्हें देखकर उनके प्रोफ़ेशन का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.

उन्हें जब भी कला विभाग से कॉल आता है, तो वो वहां बिना देर किये पुहंच जाती हैं. क्लास में पहुंचते ही पहले अपने कपड़े उतारती हैं और फिर उनसे जिस पोज़ में बैठने के लिए बोला जाता है, वो वैसे ही बैठ जाती हैं. मगर वो हमेशा कनखियों से ये भी देखती रहती हैं कि कहीं कोई उन्हें बुरी नज़र से तो नहीं घूर रहा.

अपने काम के पहले दिन को याद करते हुए कृष्णा कहती हैं- ‘पहली बार कपड़े उतार रही थी तो बार-बार रुक जाती. आखिरी कपड़े को कसकर देर तक पकड़े रखा. छोड़ने में आधा-पौन घंटा तो लगा ही होगा. आंसू टपकने को होते, फिर भूखे बच्चों का ख्याल रोक देता. शर्म खुलने में बखत नहीं लगता, जब बात पेट की हो.’
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वो घंटों अपने परिवार की ख़ातिर कुछ लोगों के सामने बिना कपड़ों के बैठी रहती है. कमरे में तेज़ रौशनी होती है, जिससे उनके शरीर का एक-एक अंग साफ़ नज़र आता है. इस दौरान न तो उसे हिलने-डुलने की इज़ाज़त होती है और न ही शर्म से अपनी आंखें बंद करने की. उन्हें अपनी हया को दबाते हुए ऐसे बर्ताव करना होता है, जैसे सब कुछ ठीक है.

इसके साथ ही वो बताती हैं कि 'सर्दियों में तो स्टूडेंट्स मोटे कपड़े पहने उनकी तस्वीर उकेरते रहते हैं, और मैं कंपकपाती रहती हूं, फिर भी टस से मस नहीं होती. 6 घंटे के इस काम में मुझे 3 ब्रेक मिलते, जिसमें मैं सबसे पहले कपड़े पहनती और हाथ-पैर सीधे करती. मुझे तकलीफ़ तब होती है जब महीना चलता है. मगर फ़ोन आ गया, तो जाना ही होगा. तब बड़ा-सा कच्छा पहनकर बैठती हूं.'

कृष्णा यूपी के बदायूं की रहने वाली हैं, जिसकी शादी शादी 14 साल की उम्र में ही हो गई थी. पति के पहली पत्नी से 3 बच्चे थे और बाद में ये संख्या 5 हो गई. घर की माली हालत खस्ता थी और पति की कमाई से बच्चों को पेटभर खाना भी नहीं मिल पाता था. कृष्णा पहले बड़े-बड़े घरो में साफ़-सफ़ाई का काम करती थी. वहीं उनको किसी से पता चला कि कॉलेज में पेंटिंग के लिए मॉडल चाहिए होती हैं और वो आम लड़की की तरह ही होती हैं.

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इसके बाद उन्होंने मॉडलिंग करनी शुरू की. पहले उनको अलग-अलग तरह के कपड़ों में मॉडलिंग करनी होती थी, जिसके लिए उन्हें 100 रुपये मिलते थे. फिर एक दिन उनको न्यूड मॉडलिंग करने के बारे पता चला, जिसमें 6 घंटे के 220 रुपये मिलते थे.

वो बताती हैं कि 'तब जवान थी, लगा कर लूंगी. शुरू में कपड़ों के साथ मॉडलिंग करती. साड़ी या सलवार-कुरती पहनकर. आंचल या दुपट्टा जरा इधर से उधर नहीं होने देती. तब वो भी आसान नहीं लगता था. घंटों बिना हिले-डुले बैठे रहना होता. हाथ-पैर सुन्न पड़ जाते. अलग-अलग तरह से बैठाया जाता, कई बार नस खिंच जाती. अक्सर मुझसे बाम की महक आती.'

बच्चों का खाना और पढ़ाई के लिए पैसों की ज़रूरत थी, इसी मजबूरी के आगे उन्हें अपनी सारी कशमकश को ताक पर रखना पड़ा. इस तरह जब पहली बार वो अपनी कमाई के 2200 रुपये लेकर घर पहुंची, तो पति ने उसे खू़ब खरी-खरी सुनाई। वो उनपर शक करने लगा और कॉलेज जाना बंद करा दिया.

जब कुछ दिनों तक कृष्णा नहीं आई, तो कालेज के प्रोफ़ेसर ख़ुद उनके घर आए और उसके पति को अपनी कार में कला विभाग ले गए. यहां उन्होंने कृष्णा के पति को अच्छे से समझाया कि वो जो कर रही है इसमें कुछ ग़लत नहीं है. तब जाकर उनके पति ने इसे जारी रखने की इज़ाज़त दी.

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कॉलेज के प्रोफ़ेसर और स्टूडेंट के प्यार ने उन्हें सहज होने में काफ़ी मदद की. उन्हें ये काम करे हुए 18 साल हो गए हैं, अब तो वो ख़ुद जाकर उनसे बात करती हैं और बताती हैं कि इस हिस्से को उन्होंने सही से नहीं बनाया है. हां, एक बात बताते हुए उनके चेहरे पर सिकन नज़र आती है, वो ये कि आज तक उन्होंने मोहल्ले और बिरादरी में अपने इस काम के बारे में नहीं बताया है.

उन्होंने घर में अपने स्टूडेंट्स के द्वारा बनाई हुई कपड़ों वाली पेंटिंग्स लगा रखी हैं, इन्हें दिखा कर वो बताती हैं कि वो ये करती हैं. पहले कृष्णा बच्चों की पढ़ाई और भोजन के लिए ये काम करती थीं, अब उनकी शादी के लिए. अब उन्हें इस काम के लिए 500 रुपये दिए जाने लगे हैं.

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अपने काम को लेकर प्रतिबद्धता और प्यार उनकी बातों में साफ़ झलकता है. कृष्णा कहती हैं- ‘मैं पढ़ी-लिखी नहीं, अमीर नहीं, लेकिन फिर भी लोग मुझे याद रखेंगे. अब तक मेरी लाखों पेंटिंग्स, मूर्तियां आदि, दुनिया के पता नहीं किस-किस कोने में पहुंच गई होंगी. इस काम ने मुझे जीते-जी अमर बना दिया.’

कपड़ा जिस्म पर पहना जाता है रूह पर नहीं और एक चित्रकार इन सब चीज़ों से परे होकर रूह को खोजने की कोशिश करता है. चित्रकार की इस खोज को पूरा करने में मदद करती है, उसके सामने अपनी शर्म और भावनाओं को दबाए बैठी न्यूड मॉडल. मगर फिर भी एक न्यूड मॉडल का जीवन अंधकार से भरा होता है. शायद इसे ही कहते हैं दिए तले अंधेरा.

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