भारत न सिर्फ़ बड़ी जनसंख्या वाला देश है, बल्कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश भी है. लिहाजा, देश की तरक्की और विकास की राह में बाधाओं का होना लाज़मी है. किसी भी देश के लिए बाधाओं और समस्याओं को दूर करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रबल होना अत्यंत आवश्यक होता है और बिना इसके देश का विकास भी संभव नहीं हो सकता. हाल ही में देश में 'नोटबंदी' का फ़ैसला कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी राजनीतिक इच्छा शक्ति और साहस का परिचय दिया है. देश में काला धन और भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी मजबूत हैं, ये किसी से छुपा नहीं है. हालांकि, नोटबंदी का फ़ैसला कितना सफ़ल होगा, यह बात भविष्य के गर्भ में पल रहा है.

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काला धन और भ्रष्टाचार की तरह ही हमारे भारतीय समाज में सदियों से व्याप्त कई ऐसी बुराईयां हैं, जिन्होंने विकास के कदम को किसी खंभे से बांध कर रख दिया है. दुर्भाग्यवश इस देश में कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं, जिन पर क़ानूनी चाबुक चलाना बेहद ज़रूरी है. क्योंकि बिना इसके हमारे बदलाव और विकास का कोई महत्व नहीं रहेगा. इसलिए जब तक इन समस्याओं पर ठोस आघात नहीं किया जाता, तब तक देश की तरक्की का सपना देखना भी बेमानी होगा.

1. नदियों की सफ़ाई

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इतिहास गवाह है कि मानवीय संस्कृति और सभ्यता का विकास नदियों के तट पर हुआ है. नदियां इंसानी ज़िंदगी ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी किसी जीवनदायिनी से कम नहीं हैं. फिर भी हम मनुष्यों ने नदियों को गंदा करने का जैसे बीड़ा उठा लिया है. भारत सरकार से लेकर राज्य सरकारों की तमाम योजनाओं के बावजूद नदियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. नदियों की सफ़ाई पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन सब नाकाफ़ी है. इसलिए नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए, सरकार को योजनाओं के इतर कुछ ठोस क़ानूनी कदम उठाने की आवश्यकता है.

2. उत्सवों पर जलने वाले पटाखे

हमारा देश उत्सवों और त्योहारों का देश है. हर उत्सव और त्योंहारों को सेलिब्रेट करने के लिए पटाखे जलाने की एक विनाशकारी परंपरा चल पड़ी है. लोग हर खुशी की अभिव्यक्ति अब पटाखों को जला कर ही करना चाहते हैं. लेकिन लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि पटाखों के प्रति उनकी क्षणिक खुशी से पूरी की पूरी धरती तबाह होने को है. इन पटाखों के जलने से वातावरण इतना प्रदूषित होता है कि आपकी हर सांस आपको मौत के करीब ले जाती है. इसलिए सरकार को पटाखों पर भी कोई ठोस क़ानूनी सर्जिकल स्ट्राइक करने की ज़रूरत है.

3. खेतों में जलाए जाने वाले अवशेष

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खेतों में फसलों के अवशेष जलाए जाने से काफ़ी मात्रा में धूल-कण हवा में मिल जाते हैं, जिसकी बानगी हमें हर साल नवंबर-दिसंबर के महीनों में जानलेवा धुंध के रूप में देखने को मिलती है. हालांकि, यह ज़रा सा विवादित मुद्दा है. किसान के पास जलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. सरकार इसे रोकने के लिए कई कदम उठा चुकी है, लेकिन हक़ीक़त तो ये है कि विकल्पहीन किसानों को जब तक सरकार कोई ठोस और कारगर विकल्प मुहैया नहीं करा देती, इस प्रक्रिया में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं दिखती.

4. प्रदूषण की गोद में जाता देश

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प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप है, जो विज्ञान की कोख से जन्मा है और जिसे सहने के लिए अधिकांश लोग मजबूर हैं. हालांकि, इस समस्या के लिए इस देश का हर एक नागरिक जिम्मेदार है. प्रदूषण के विभिन्न आयाम मसलन, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के लिए लोग ही जिम्मेदार हैं. सरकार इसके नियंत्रण पर कई कदम उठा चुकी है, लेकिन यह समस्या है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. जिस तरह से सरकार ने काले धन और भ्रष्टाचार की सफ़ाई के लिए कड़ा कदम उठाया है, प्रदूषण को लेकर भी इसी तरह के कठोर कदम उठाने की ज़रूरत है.

5. पर्यटन स्थलों की सफ़ाई

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हम भारतीय साफ़-सफ़ाई को लेकर कितने संजीदे होते हैं, इसकी एक झलक आपको सार्वजनिक और पर्यटन स्थलों पर फैले कूड़े का अंबार से मिल सकता है. पर्यटन स्थल पर विदेशी सैलानी आते रहते हैं. हम भारतीय अकसर भूल जाते हैं कि हमारे द्वारा फैलाई गई गंदगी का असर भारत की छवि पर भी पड़ता है. साथ ही पर्यटन देश एवं राज्य के लिए कमाई का एक बेहतर ज़रिया है. इसलिए सरकार को इस दिशा में भी कुछ बेहतर क़ानूनी कदम उठाने की आवश्यकता है.

6. अव्यवस्थित सड़क यातायात व्यवस्था

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रास्ते भले ही सुनसान क्यों न हो, लेकिन हम भारतीय अपनी आदतों से इस कदर मजबूर हैं कि बिना हॉर्न बजाए रह ही नहीं सकते. हालांकि, ये समस्या अधिकतर शहरों में देखने को मिलती है, लेकिन अब गांव भी इससे अछूते नहीं रहे. बेवजह हॉर्न बजाने या फिर ट्रैफिक नियमों का पालन न करने की वजह से न सिर्फ़ दुर्घटनाएं होती हैं, बल्कि ध्वनि प्रदूषण भी होता है. सरकार अगर इस समस्या पर कोई सर्जिकल स्ट्राइक कर दे, तो सच में देश की बेहतरी की ओर यह एक सार्थक कदम होगा.

7. जनसंख्या में अंधाधुंध वृद्धि

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हमारे देश में संसाधन सीमित हैं, लेकिन उस अनुपात में जनसंख्या असीमित है. अगर देश में गरीबी-अमीरी के बीच में एक गहरी खाई है भी, तो उसकी मुख्य वजह है विशाल जनसंख्या. इस विशाल जनसंख्या के कारण हर व्यक्ति को पर्याप्त रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर नहीं हो पा रहा है. आज भी रूढ़िवादी मानसिकता जनसंख्या नियंत्रण की राह में सबसे बड़ी बाधा है. साथ ही अशिक्षा के कारण भी लोग बच्चों की सीमित संख्या का महत्व नहीं समझ पा रहे हैं. इसलिए देश की तरक्की और विकास को ध्यान में रखते हुए सरकार को जनसंख्या नियंत्रण पर भी कठोर क़ानूनी कदम उठाने की आवश्यकता है.

8. स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता

भले ही लड़कियां चांद पर चली जाएं, लड़कियां देश का नाम रौशन कर दिखाएं, लेकिन जब पुरुषों के समक्ष बराबरी की बात आती है, तो स्त्री को कमतर ही आंका जाता है. यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर लंबे समय से बहस होती आ रही है. काम के मामले में भी स्त्री को कम वेतन देना, काम के कम अवसर देना आदि इस समस्या के मूल में निहीत है. हालांकि, ये समस्या हमारे घरों से ही शुरू होती है, जिसमें हम लड़का-लड़की में भेद रखते हैं. इसलिए इसका भी इंसानी इच्छा शक्ति के साथ-साथ कानूनी इच्छा शक्ति से ही निपटारा हो सकता है.

9. वेश्यावृत्ति और मानव तस्करी

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हालांकि, ये दोनों मुद्दे कहीं न कहीं एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन दोनों का आधार एक ही है. वेश्यावृत्ति एक कड़वी सच्चाई है, जो न सिर्फ़ विकासशील देशों में, बल्कि विकसित देशों में भी धड़ल्ले से चल रही है. इसके कारण हर साल लाखों ज़िंदगियां बर्बाद होती हैं. इसमें मासूम लड़कियों को जबरन धकेला जाता है. सबसे खास बात ये है कि मानव तस्करी की एक मुख्य वजह वेश्यावृत्ति ही है. इस पेशे में जबरन धकेलने के लिए लड़कियों की तस्करी की जाती है.

10. बाल मज़दूरी

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कहते हैं देश का भविष्य बच्चों के हाथों में होता है. लेकिन जब पढ़ने, कुछ करने की उम्र में देश के बच्चों के हाथों में खुरपी, कुदाल और औज़ार थमा दिये जाते हैं. क्या फिर इस देश के उज्जवल भविष्य की कल्पना की जा सकती है? बाल मज़दूरी हमारे देश की प्रमुख समस्याओं में से एक है. देश में मैन पॉवर के सबसे बड़े स्रोत ये बच्चे ही होते हैं. कम उम्र में मज़दूरी की आग में धकेलने से इन बच्चों का न सिर्फ़ बचपन बर्बाद होता है, बल्कि इनकी ज़िंदगी भी बर्बाद हो जाती है. हालांकि, इस बाबत सरकार के कई क़ानून हैं, लेकिन अभी तक इसका कोई असर देखने को नहीं मिला है.

बहरहाल, इन समस्याओं को खत्म करना अपने आप में एक चुनौती है. जब तक इस दिशा में आम इंसान की भागीदारी नहीं होगी, तब तक खुद सरकार भी प्रबल इच्छा शक्ति होते हुए भी कुछ नहीं कर सकती. लेकिन किसी भी राष्ट्र के लिए नागरिक, क़ानून से बड़ा नहीं होता. इसलिए राजनीतिक द्वेषों को भूलकर सरकार के साथ- साथ सभी विपक्षी पार्टियों को एक जुट होकर इन समस्याओं पर क़ानूनन काम करना होगा.