एक केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया. जस्टिस ए.के.गोएल, यू.यू.ललित ने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फ़ैसले को ख़ारिज करते हुए कहा कि किसी भी नाबालिग या मानसिक रोग से पीड़ित महिला के बलात्कारी की ज़मानत नहीं हो सकती. भले ही पीड़िता बयान देने की हालत में ना हो, लेकिन इस वजह से आरोपी को ज़मानत नहीं मिल सकती.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2008 में नागपुर की मानसिक तौर पर अस्वस्थ एक नाबालिग लड़की के बलात्कार के आरोपी को रिहा कर दिया था, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को 7 साल की सज़ा भी सुनाई.

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सज़ा को ख़ारिज करते हुए आरोपी को रिहा कर दिया था क्योंकि पीड़िता की जांच नहीं हुई थी.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ये भी कहा कि आरोपी को सज़ा सुनाने के लिए जितने सुबूत चाहिए थे, सब मौजूद थे. रेप सर्वाइवर की मां का बयान भी यही साबित करता है कि पीड़िता को आरोपी बहला-फुसला कर अपने साथ ले गया था. जिस दिन ये घटना घटी उस दिन दोनों को साथ देखा गया था. पीड़िता के साथ जो भी हुआ उसने सब अपनी मां को बताया. मेडिकल Examination में भी बलात्कार की पुष्टि होती है. इतने सारे जांच के आधार पर ही ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाया था, हाईकोर्ट का उसे खारिज करना सरासर ग़लत है.

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को कुछ Guidelines दिए जाएंगे, जिसके आधार पर ऐसे केस के फ़ैसले होंगे, जिसमें पीड़िता अपने साथ हुए Sexual Crime के बारे में बयान देने में अक्षम हो. सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स को, क्रिमनल केस के Victims के Examination के लिए अनुकूल वातावरण वाले स्पेशल सेंटर बनाने के निर्देश भी दिए हैं. दिल्ली हाईकोर्ट का अनुकरण करते हुए अक्षम पीड़ितों का बयान लेने के निर्देश दिए हैं.

कई बार पीड़ितों को उनके मानसिक स्वास्थ्य के कारण भी न्याय नहीं मिल पाता. सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला सराहनीय है.

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