‘लिख के बताएं कि दे के... मतलब, अरे हमारा नाम...'

'तनु वेड्स मनु' का ये डायलॉग हर सिने-फै़न को याद होगा और याद होगा पप्पी नाम का वो किरदार, जिसने इस फ़िल्म के ज़रिये लोगों को खूब हंसाया और गुदगुदाया भी. हम बात कर रहे हैं दीपक डोबरियाल की, जो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे कलाकार हैं, जिनकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती. इन्होंने अपने करियर में छोटे-छोटे रोल निभाएं हैं, लेकिन उन्हें इस शिद्दत से निभाया है कि आने वाली पीढ़ी भी उन्हें याद करेगी और उनसे प्रेरणा लेगी.

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दीपक डोबरियाल भले ही आज पूरी दुनिया में जाने-माने एक्टर हों, लेकिन वो हमेशा से ही एक्टर नहीं बनना चाहते थे. उनके पिता तो दीपक को अपनी तरह ही सरकारी नौकरी करते देखना चाहते थे. लेकिन जब उन्होंने 12वीं की परीक्षा पास की तो उन्हें एहसास हुआ की जीवन में एक लक्ष्य होना ज़रूरी है, क्योंकि उनका हर साथी/क्लासमेट अपना-अपना सपना साकार करने निकल पड़ा. उनके एक दोस्त ने दीपक को थिएटर करने सलाह दी.

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दिल्ली में रहते हुए उन्होंने मंडी हाउस में अपना पहला प्ले किया, जिसका नाम था बकरी. इसके लेखक सर्वेश्वर दयाल थे. यहीं एक प्ले के दौरान दीपक पर फ़ेमस थियेटर आर्टिस्ट अरविंद गौर की नज़र पड़ी. उन्होंने दीपक में छुपे एक कलाकार को पहचान लिया और अस्मिता थिएटर जॉइन करने को कहा.

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तकरीबन 7 साल थिएटर करियर में दीपक डोबरियाल ने 'तुगलक','रक्त कल्य़ाण', 'अंधा युग' जैसे कई प्ले किये. लेकिन आमदनी का कोई ठोस ज़रिया न होने और परिवार पर ही आश्रित होने के कारण उनके पिता उनसे ख़फ़ा रहने लगे. उन्होंने कई बार दीपक को इस फ़ील्ड को छोड़ने को कहा, लेकिन दीपक के ताऊ जी ने हमेशा उनका साथ दिया और उन्हें अभिनय के क्षेत्र में करियर बनाने को प्रोत्साहित किया.

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इसके बाद दीपक सिनेमा में हाथ आज़माने की ख्वाइश लिये मुंबई आ गए. यहां आकर पता चला कि थिएटर से तो बॉलीवुड की दुनिया बहुत अलग है. दीपक को कड़ा संघर्ष करना पड़ा. वो कई प्रोड्क्शन हाउस और डायरेक्टर्स के ऑफ़िस के चक्कर लगाते. इसी बीच उन्हें एक शॉर्ट फ़िल्म, 'बॉम्बे समर' में काम करने का मौका मिला. तकरीबन 3 साल तक वो अपनी फ़ोटोज़ के साथ रामगोपाल वर्मा के प्रोडक्शन हाउस के भी चक्कर काटते रहे.

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इसके बाद उन्हें पहली फ़िल्म 'मकबूल' में इरफ़ान खान के दोस्त का छोट-सा रोल मिला. यहीं से उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत हो जाती है. उन्हें जो भी रोल मिलते गये, वो करते चले गये. उनके फ़िल्मी करियर में नया मोड़ तब आया, जब फ़िल्म 'ओमकारा' से चमकना शुरू हुआ. इस फ़िल्म में लंगडे (सैफ़ अली खान) के दोस्त राजू तिवारी के किरदार के लिये उन्हें अवॉर्ड तक मिला. इसके बाद उनके एक्टिंग की गाड़ी निकल पड़ी और वो 'गुलाल', 'शौर्य', 'तनु वेड्स मनु', 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स', 'प्रेम रतन धन पायो','लखनऊ सेंट्रेल', 'हिंदी मीडियम', 'कलाकांडी' जैसी फ़िल्मों में ख़ुद को बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट निखारते गये.

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इरफ़ान खान के साथ फ़िल्म 'हिंदी मीडियम' में दीपक ने 'श्याम प्रकाश' नाम के एक आम आदमी का किरदार निभाया था. इसे देखकर ऐसा लगा ही नहीं की वो एक्टिंग रहे हैं. इसी तरह जब उन्होंने 'शौर्य' में कैप्टन जावेद का रोल. 'गुलाल' और 'मकबूल' का एक्टर के राइट हैंड वाला रोल देखकर ऐसा लगा, जैसे वो उसे जी रहे हैं. आनंद एल राय की 'तनु वेड्स मनु' का पप्पी वाल किरदार अगर कोई और करता तो शायद ही वो इतना फ़ेमस होता.

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'बागी-2' में उन्होंने उस्मान लंगड़े का रोल निभाया था. उसे देख ऐसा लगा जैसे सच में हम किसी दिव्यांग को ड्रग्स का धंधा करते देख रहे हैं. फ़िल्म 'लाल कप्तान' में दीपक ने सनकी जासूस ट्रैकर का रोल प्ले किया था. ऐसा जासूस जिसकी नाक कुत्ते से भी तेज़ थी. इस साल रिलीज़ हुई फ़िल्म 'अंग्रेज़ी मीडियम' में दीपक ने इरफ़ान ख़ान के भाई का रोल प्ले किया था. ऐसा भाई जो पुस्तैनी मिठाई की दुकान के नाम के लिए लड़ता है लेकिन मुसीबत आने पर साथ खड़ा नज़र आता है.

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दीपक ने अपने हर एक कैरेक्टर को ऐसे ही नहीं कर दिया कि चलो भई एक सीन है इसे ऐसे-ऐसे कर देना है. वो उस किरदार की तह तक जाते हैं और उसे अच्छे से जांच परख कर पेश करते हैं. लेकिन दीपक को देखकर आप कभी भी ये नहीं कह सकते कि वो बॉलीवुड स्टार हैं. वो आज भी उसी सादगी के साथ जीते हैं जैसे पहले जीते थे. आज भी ऑटो से शूटिंग पर पहुंच जाते हैं. ख़ास बात ये है कि उनके बेटे तक ये नहीं पता था कि वो क्या करते हैं.

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हमें भी उम्मीद है कि वो अपने उम्दा किस्म के अभिनय से ऐसे ही आगे भी हमारा मनोरंजन करते रहेंगे.