पिछले साल इन्टरनेट पर एक ऐसी मार्मिक तस्वीर वायरल हुई, जिसने पूरी दुनिया के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया. एक छोटा बच्चा समुद्र के किनारे पर मुंह के बल मरा पड़ा था, किसी और देश में शरण खोजने के क्रम में वो अपने परिवार से या तो बिछड़ गया होगा या भीड़-भाड़ में दब कर ज़िंदगी का दामन छोड़ दिया होगा. बड़ी मुश्किल से वो तस्वीर लोगों के जेहन से निकली थी कि एक नयी तस्वीर सामने आ गयी है.

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ये तस्वीर जो आप ऊपर देख रहे हैं, ये किसी सीरियन रिफ्यूजी की तस्वीर नहीं है बल्कि ये तस्वीर है एक बच्चे की, वो बर्मा का रोहिंग्या मुसलमान है. इस बच्चे का नाम मोहम्मद शोहयेत था और इसको दुनिया में आये हुए सिर्फ़ 16 महीने ही हुए थे. म्यांमार (पुराना नाम बर्मा) में तकरीबन 14 लाख मुसलमान कई सदियों से रहते आये हैं, लेकिन ताज्ज़ुब की बात है कि न तो वहां के लोग इन्हें अपना समझते हैं और न ही वहां की सरकार. इस हालत में जीने को मजबूर इन लोगों को भीषण दमन का सामना करना पड़ता है. ये लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर जिस स्थिति में रह रहे हैं, अगर आप या हम वो देख लें, तो आंखों से आंसू आ जाएंगे.

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कहा जाता है कि ये लोग ईसा पूर्व 1400 के आस-पास आकर बर्मा के अकरान प्रांत में बस गये थे. सब ठीक ही चल रहा था, तब 1785 में अकरान पर बौद्ध लोगों ने कब्ज़ा कर लिया और फिर इनका दमन करना शुरू कर दिया. इनमें से कुछ वहां से खदेड़ दिए गये या मौत के घाट उतार दिए गए. फिर इनका हर बार दमन किया गया, चाहे वो विश्व युद्ध हो या फिर अंग्रेजों का शासन. इनकी घर की औरतों को जानवरों की तरह नोचा गया, इनके घर जलाए गये, इनके बच्चों को घटिया ज़िंदगी जीने पर मजबूर किया गया.

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बर्मा के सैनिक शासकों ने 1982 में नागरिकता कानून के आधार पर उनसे उनके बचे-खुचे अधिकार भी छीन लिए. ये लोग सुन्न इस्लाम को मानते हैं और बर्मा में इन पर सरकारी प्रतिबंधों के कारण ये पढ़-लिख भी नहीं पाते, बस बुनियादी इस्लामी तालीम ही हासिल कर पाते हैं. 1990 के दौर में लगभग ढाई लाख मुस्लिम वहां से भाग कर या बांग्लादेश आ गये थे, वहां भी उनके साथ दमनकारी बर्ताव ही किया गया. इन पर बर्बरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले बीस साल में उन्हें इस बात की परमिशन नहीं है कि वो अपने किसी रोहिंग्या स्कूल या मस्ज़िद की मरम्मत करवा सकें. म्यांमार में लोकतंत्र का झंडा थाम कर सत्ता में आने का ख़्वाब देखने वाली आंग सान सू की का भी यही मानना है कि वो इस देश के नहीं हैं. हालांकि उन्होंने रोहिंग्या लोगों की हालत पर चिंता तो ज़ाहिर की थी, पर सैनिक शासन की आलोचना का साहस नहीं जुटा पायी.

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संयुक्त राष्ट्र संघ यूं तो बड़ा मुखिया बनता फिरता है, लेकिन जब बात आई इनकी मदद की तो बस एक रिपोर्ट बना कर निपटा दिया. वो भी मानता है कि रोहिंग्या मुसलमान दुनिया के ऐसे अल्पसंख्यक हैं, जिनका सबसे ज़्यादा दमन किया गया है. कई बार संयुक्त राष्ट्र म्यांमार को इन मुसलमानों पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए कड़े निर्देश भी दे चुका है. पर इसमें नई बात क्या है, क्या मानवाधिकार आयोग वालों को ये इंसान नहीं लगते या फिर किसी भी समुदाय को इंसान की श्रेणी में आने के लिए एक देश का नागरिक होना ज़रूरी है? पहले इनके खिलाफ़ हिंसा करने में बस बौद्ध लोग ही होते थे, जबकि अब अहिंसा के प्रवर्तक माने जाने वाले बौद्ध भिक्षु भी इसमें शामिल हैं.

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क्यों दुनिया इतनी छोटी पड़ती जा रही है कि कोई लोगों को रहने की थोड़ी सी जगह देने को तैयार नहीं है. क्या उनकी यही गलती है कि वो कहीं भी रह कर बस अपना जीवन बिताना चाहते हैं या फिर ये गलती है कि वो इस धरती पर पैदा क्यों हो गए? जो लोग वातानुकूलित कमरों में बैठ कर जाति और धर्म की राजनीति करते रहते हैं, क्या उन्हें ये कोई मसला नहीं दिखता? खैर दिखे भी तो क्या कर सकता है कोई, क्यों इस दुनिया में आपको खुद को इंसान साबित करने के लिए किसी न किसी देश का नागरिक होना पड़ेगा और ये बेचारे रोहिंग्या मुसलमान तो किसी देश के नहीं हैं!

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