भारत... ये शब्द सुनते ही अनगिनत बातें दिमाग़ से गुज़र जाती है. साढ़े तीन अक्षर के इस शब्द ने संसार को बहुत कुछ दिया. संसार के अन्य देशों के आक्रमणों को सहा और आज भी सीना तान कर विश्व के मानचित्र में मौजूद है. इस मिट्टी पर अनेक वीरों ने जन्म लिया है, हमारे इतिहास की किताबों में उन पर कई पृष्ठ लिखे गए हैं. लेकिन ये धरती सिर्फ़ वीरों या फिर अशोक, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे सूरमाओं की ही धरती नहीं है. इस धरती पर कई वीरांगनाओं ने भी जन्म लिया है. समय-समय पर उन्होंने अपनी वीरता भी दिखाई है.

आज ये लेख है देश की उन्हीं वीरांगनाओं के नाम, जिनकी चर्चा आजकल कम ही होती है. या फिर यूं कहें कि इस पितृसत्तामक समाज ने ऐसी अशेष कहानियों को ढापने की कोशिश की है, क्योंकि हम सिर्फ़ रानी लक्ष्मीबाई की ही वीरगाथा से अच्छी तरह परिचित हैं.

1. रानी चेन्नम्मा, कित्तूर

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अंग्रेज़ सरकार इस हार से बौखला गई और कित्तूर पर अधिकार करने के लिए बहुत बड़ी सेना लेकर आई. इस लड़ाई में चेन्नम्मा हार गईं और अंग्रेज़ों ने उन्हें उनके ही महल में क़ैद कर लिया. ये हार भी उन्हें उनकी सेना में मौजूद कुछ गद्दारों के कारण मिली.

उनकी वीरता को याद करते हुए हर साल 22-24 अक्टूबर को कित्तूर उत्सव मनाया जाता है.

2. बेलावाड़ी मल्लम्मा

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बेलावाड़ी की ये वीर रानी बेलगाम से थीं. वे सोड राजा मधुलिंग नायक की पुत्री थी. बेलावाड़ी मल्लम्मा को सावित्री बाई के नाम से भी जाना जाता था. वे लिंगातों की रानी थी. बेलावाड़ी मल्लम्मा ऐसी पहली महिला थीं जिन्होंने दुश्मनों से लड़ने के लिए महिलाओं की टुकड़ी बनाई थी. 17वीं शताब्दी में उनकी इस टुकड़ी ने मराठाओं से लड़ाई लड़ी. एक प्रचलित कथा के अनुसार, युद्ध में शिवाजी के एक सैनिक ने रानी के घोड़े की टांग काट दी. रानी गिर पड़ी, जब वे दोबारा उठी तो उन्हें कैद कर लिया गया और शिवाजी के सामने लाया गया. रानी के शौर्य और वीरता को देखकर शिवाजी ने उनसे माफ़ी मांगी और उन्हें और उनके राज्य को छोड़ दिया.

3. केलाड़ी चेन्नम्मा

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कर्नाटक में ही एक राज्य था केलाड़ी. चेन्नम्मा शाही घराने से नहीं थी. राजा सोमशेखर नायक से उन्होंने विवाह किया था. चेन्नम्मा ने औरंगज़ेब के विरुद्ध जाकर शिवाजी के दूसरे बेटे, राजाराम को पनाह दी थी. राजाराम मुग़लों से भागते फिर रहे थे. औरंगज़ेब ने राजाराम को बंदी बनाने के लिए एक बड़ी सेना भेजी, जिसे रानी चेन्नम्मा ने पराजित कर दिया. रानी की वीरता के आगे मुग़ल शासक को झुकना पड़ा.

4. रानी अब्बक्का

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चौटा वंश की रानी अब्बक्का, उल्लाल की रानी थीं. उनके राज्यकाल में ही पुर्तगालियों ने उनके राज्य में बंदरगाह बनाना चाहा. रानी अब्बक्का ने 1525 में पुर्तगालियों से जंग लड़ी और उन्हें धूल चटा दिया. उस जंग के बाद रानी अब्बक्का को रानी अभया के नाम से भी जाना गया. इस वीरांगना की स्मृति में आज भी हर साल उल्लाल में उत्सव मनाया जाता है.

5. अहिल्याबाई होल्कर

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मालवा की इस रानी का नाम तो हम सभी जानते ही होंगे. 8 वर्ष का आयु में उनका विवाह खांडेराव होल्कर से हो गया. 21 वर्ष की आयु में वे विधवा हो गईं. उन्होंने अपने बेटे को गद्दी पर बिठाया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनकी भी मृत्यु हो गई. पिता और बेटे की मृत्यु के शोक़ को उन्होंने ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया. इंदौर की रानी बनने के बाद उन्होंने बड़ी ही चालाकी से पेशवा को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अपनी प्रजा को वे बेटे जैसा ही मानती थी.

ऐसी ही अनेक वीरांगनाओं ने ना जाने कितनी ही लड़ाईयों में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए. उनकी वीरता को शत-शत नमन.