स्कूल में हमें गर्मियों की छुट्टियों में सुलेख लिखने के लिए दी जाती थी, जिसे हम एक ही दिन में निपटाने की कोशिश करते थे. उस वक़्त हम ये नहीं समझते थे कि ये हमारी लेखनी को सुधारने में मददगार होगा. इसके बाद जैसे ही हम बड़े हुए, अपने पैरों पर खड़े हो गए, टेक्नोलॉजी ने फिर से हमारी लेखनी पर पूर्ण विराम लगा दिया. अब हर कोई स्मार्टफ़ोन ,लैपटॉप, कंप्यूटर आदि पर लिखता-पढ़ता नज़र आता है. अगर हम आपसे कहें कि टेक्नोलॉजी के इस ज़माने में आज भी एक अख़बार ऐसा है, जो पिछले 91 वर्षों से हाथों से लिखा जा रहा है तो?

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चेन्नई में ऐसा ही एक न्यूज़पेपर हर दिन लिखा जाता है और हज़ारों लोग इसे बड़े ही चाव से पढ़ते हैं. इस अख़बार का नाम है 'द मुसलमान', जो संभवत: दुनिया का अकेला हाथों से लिखा जाने वाला न्यूज़पेपर है. ख़ास बात ये है कि इसे आज भी इसे स्याही वाली कलम से लिखा जाता है.

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'द मुसलमान' के एडिटर आरिफु़ल्लाह ने बताया कि इसकी शुरुआत 1927 में उनके दादा सैयद अजातुल्लाह ने की. उसके बाद इसे आरिफु़ल्लाह के पिता ने चलाया और अब वो इसे चला रहे हैं. इसके सभी कर्मचारी हाथ से लिखने के लिए प्रतिबद्ध हैं और अपने काम को दिलो-जान से चाहते हैं.

इस अख़बार में करीब 6 लोग कार्य करते हैं, 3 रिपोर्टर और 3 राइटर, जिन्हें उर्दू में ख़ातिब कहा जाता है. इसके अलावा देशभर के कई उर्दू जानकार और लेखक इसमें अपना सहयोग देते हैं. 1 बजे तक पूरा अख़ाबार तैयार कर लिया जाता है और शाम तक इसे 21000 लोगों तक पहुंचा दिया जाता है.

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इस अख़बार की अामदनी का ज़रिया इसे मिलने वाले विज्ञापन हैं. इसकी कीमत सिर्फ़ 75 पैसे है. एडिटर आरिफुल्लाह ने 'द हिंदू' को दिए अपने इंटरव्यू में कहा, ‘Calligraphy यानी हाथ से लिखा जाना 'द मुसलमान' का हार्ट है, जिसके बिना इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती. इसे मैं ज़िंदगीभर चलाता रहूंगा और मेरी अाने वाली पीढ़ी भी.’
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'द मुसलमान' बंटवारे के समय भी प्रकाशित होता था और उम्मीद है कि आगे भी ये ऐसे ही इस अनूठे प्रयास को जारी रखेगा. भारतीय भाषा में हाथ से लिखे जा रहे किसी ऐसे ही अख़बार के बारे में अगर आप जानते हों, तो हमें ज़रूर बताएं. ऐसे प्रयास को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने से ज़्यादा संतोषजनक काम नहीं हो सकता.

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