साल 1939 में जर्मनी की Hohlenstein-Stadel गुफ़ाओं में करीब 40 हज़ार साल पुरानी मूर्ती ​पाई गई थी. जर्मनी के पुरातत्त्व विभाग के लिए ये मूर्ती थोड़ी अजीब थी. इसका सिर शेर का था और धड़ इंसान का. न ये पूरी तरह नर दिख रहा था और न ही किसी मादा की तरह. इस मूर्ती पर रिसर्च चल रही थी, पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रिसर्च ठप पड़ गई.

करीब 30 साल बाद ये फ़िर पुरातत्त्व विभाग के हाथ लगे. ये पहली इंसान की प्रतिमा थी जिस पर मनुष्य का सिर न हो कर शेर का था. उसके बाद साल 1997 के करीब इस मूर्ती के और भाग पाए गए.

कई सालों तक इसके लिंग पर बहस हुई.

शुरुआत में ये प्रतिमा किसी नर-जीव की मानी जा रहा थी. बाद में ये पाया गया कि ये सिर 'Höhlenlöwin' यानी यूरोप की गुफ़ाओं में पाई जाने वाली शेरनी का है. वैज्ञानिकों के हिसाब से ये न नर है और न ही मादा. बाद में जर्मनी की बाकी जगहों में ऐसी और प्रतिमाएं पाई गई. जिससे ये पता लगता था कि पुराणों में ऐसे जीवों को विशेष दर्जा दिया गया था.

विष्णु भगवान के चौथे अवतार 'नरसिंह' से मिलती है ये प्रतिमा

पुराणों में नरसिंह को ऐसा ही बताया गया है. नरसिंह विष्णु भगवान के चौथे अवतार थे. नरसिंह ने हिरण्यकश्यप के वध के लिए अवतार लिया था. हिरण्यकश्यप का ब्रह्ममा जी का वरदान था कि वो न दिन में मर सकता है, न रात में. न अस्त्र से न शस्त्र से. न इंसान द्वारा न जानवर द्वारा. न सुबह न रात में और न घर के अंदर न बाहर. इसीलिए नरसिंह प्रकट हुए थे जो न इंसान थे और न ही जानवर. उनका सिर शेर का था और धड़ इंसान का.

इस हज़ारों साल पुरानी प्रतिमा को नरसिंह और हिन्दु पुराण से जोड़ा जा रहा है. फ़िलहाल ये प्रतिमा जर्मनी में Ulm के Ulmer Museum में रखी हुई है.

Article Source- Theboldindian