घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही,

रास्ते पर सुनते हैं सीटियां.

मेट्रो में चढ़ते ही, बस में घुसते ही,

सहनी पड़ती हैं फ़ब्तियां.

एक मशहूर गाने पर कुछ शब्द इधर-उधर कर के एक छोटी सी कविता लिख तो दी, पर ये कितना सच है ये हम स्त्रियां और लड़कियां ही समझती हैं.

Source- E-pao

दुपट्टा बांध लो मुंह पर, कोई पीछा नहीं करेगा...

रात में भाई लेने आ जाएगा...

अकेले ट्रेन से सफ़र करोगी? दिमाग़ ख़राब है तुम्हारा? पता नहीं क्या हो जाए.

और अगर कुछ हो जाए तो ऐसा ही होता है, 'चुप हो जाओ', 'बुरी याद की तरह भूल जाओ', वाली टिप्पणी.

बहुत सी महिलाओं ने ये बातें घरवालों, रिश्तेदार, दोस्तों से सुनी होंगी. बेहद ख़ुशनसीब होती हैं, वो महिलाएं जिनके घरवाले उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने, हार न मानने और घर पर न दुबकने की हिदायत देते हैं.

छेड़छानी की घटनाएं हमारे देश में इतनी आम हो गयी हैं कि हमने उसी तरह से जीना सीख लिया है. लेकिन हज़ारों की इस भीड़ में कोई न कोई आवाज़ हिम्मत करती है और कहती है, 'बस अब और नहीं'. ऐसी ही एक लड़की है आयुषी अग्रवाल.

आयुषी भी छेड़छाड़ का शिकार हुई, लेकिन उसने चुप न बैठने का निर्णय लिया. पढ़िए इस लड़की की दास्तां जो उसने कुछ दिनों पहले फ़ेसबुक पोस्ट के ज़रिए साझा की-

'मैं रात की ट्रेन से इलाहाबाद से दिल्ली जा रही थी. मेरी सीट के आस-पास के सभी बर्थ पर पुरुष पैसेंजर थे, जिससे मैं थोड़ा असहज महसूस करने लगी. पर मैंने ख़ुद को बेकार की चिंता में फंसने से रोका और सो गई.

बीच रात में मेरी आंख खुली तो मैंने देखा कि मेरी लोअर बर्थ थी और मेरे बर्थ के ऊपर जिस पैसेंजर(जिसकी उम्र 30 के आस-पास थी और जिसने मुझे गुड़िया कहकर बुलाया) की सीट थी, वो मेरे पैरों के पास बैठा था. मुझे महसूस हुआ कि उसका हाथ मेरे दाएं घुटने के ऊपर है. मुझे अजीब लगा लेकिन मैंने ख़ुद को समझाया कि 'उससे ये ग़लती से भी हो सकता है, शायद वो ढंग से बैठने की कोशिश कर रहा हो या फिर उसे नींद आ गई हो'. मैंने हल्के से अपनी आंखें खोली और देखा कि वो अपने फ़ोन में नज़रे गड़ाए बैठा है. मैं ख़ुद को समझा ही रही थी कि उसका हाथ मेरे घुटने से और ऊपर सरकने लगा. अब शक़ की कोई गुंजाइश नहीं थी. मैंने गुस्से और आश्चर्य के साथ कहा, 'आप क्या कर रहे हैं?' उसने Sorry-Sorry कहा और वहां से चला गया. अगले दो घंटे तक मैं यही सोचती रही कि मुझे क्या करना चाहिए. मैंने अपनी साथ और अपने दोस्तों के साथ हुई हर छेड़छाड़ की घटना को याद किया. मैंने हर उस पल को याद किया जब मेरे दिमाग़ में आया हो कि काश मैं छेड़छाड़ करने वाले को पुलिस के पास पहुंचा पाती.

मैंने टीटी से संपर्क किया. उसने ध्यान से मेरी बात सुनी और कहा, 'आपने तब ही क्यों नहीं बोला? अब क्या हो सकता है? आपने तभी उसे थप्पड़ क्यों नहीं मारा?' एक अन्य सहयात्री ने कहा, 'आप अकेली ट्रेवल कर रही हैं, इसीलिए.' मेरे पापा ने मुझे बताया था कि हर ट्रेन में पुलिसवाले होते हैं, मैंने टीटी से कहा कि वो पुलिस बुलाए.

पुलिस आई और उस आदमी को जगाया. मैंने उससे पूछा कि बीच रात में उसका हाथ मेरी जांघों तक कैसे पहुंचा? उसने बहाना बनाया और कहा कि उसे नींद आ गई थी. जब की सोने के लिए उसके पास एक पूरी सीट थी. ये सच नहीं था क्योंकि मुझे अच्छे से याद था कि वो फ़ोन में कुछ देख रहा था. मैंने पुलिस से कहा कि मुझे रिपोर्ट लिखवानी है. वो आदमी माफ़ी मांगने लगा. 'मैं शादीशुदा हूं. मेरी ज़िन्दगी ख़राब हो जाएगी' ये सब कहने लगा. मैं गुस्से में थी, समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए. फिर मैंने तय किया कि इस मामले को रफ़ा-दफ़ा नहीं करना. कुछ यात्री भी मुझे प्रोत्साहित कर रहे थे.

हम दिल्ली पहुंचे और पुलिस मुझे थाने ले गई. मैंने एफ़आईआर दर्ज करवाई, जिसमें 2 घंटे लगे. पुलिस ने भी मुझे केस वापस लेने के हिंट दिए.

इसी बीच उस आदमी का परिवार वहां पहुंच गया और मुझे केस वापस लेने के लिए कहने लगा. उन्होंने मेरी कार तक मेरा पीछा किया और मुझे अंदर बैठने से भी रोका. दोपहर में मैंने तीस हज़ारी पर 1 घंटे तक पुलिस का इंतज़ार किया. हम कोर्टरूम से कोर्टरूम मेरा स्टेटमेंट रेजिस्टर करने के लिए भटकते रहे. इसमें भी तकरीबन 2 घंटे लगे. मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि महिला मेजिस्ट्रेट ने मुझे दबाव में आकर केस वापस न लेने की हिदायत दी.'

आयुषी ने पोस्ट के अंत में लिखा, ये हर उस वक़्त के लिए जब मैंने और मेरे दोस्तों ने कुछ न कर पाने के लिए ख़ुद पर दया दिखाई हो.

आयुषी ने सभी औरतों के लिए संदेश भी दिया,

हमारे पास भी रात में अकेले सफ़र करने का हक़ है. अगर आपके साथ भी ऐसा हो, तो चुप मत बैठना, आवाज़ उठाना.

More Power To You आयुषी.

Source- Facebook