कुछ सवाल हैं आप से... आख़री बार खुलकर कब हंसे थे? बग़ैर किसी टेंशन के, दुख के, आराम से कानों तक मुस्कुराहट कब खींची थी?

क्या आप अपने काम से, आपको मिलने वाली पगार से संतुष्ट हैं, ख़ुश हैं?

सोचिए... 3 वक़्त पेटभर खाना मिलने, नर्म बिस्तर और मुलायम तकिए पर 6 घंटे पड़े रहने के बाद भी हम ख़ुश नहीं हो पाते. इन सबके बावजूद कई लोग छोटी-छोटी बातों से परेशान होते हैं और जितना भी मिल जाए, संतुष्ट नहीं होते. वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास थोड़ा होता है और उन्हें थोड़े की ही ज़रूरत होती है. वो थोड़े से में ही ख़ुश हो लेते हैं.

GMB Akash ने ऐसी ही एक कहानी शेयर की है. ये कहानी है 7 साल की मंजू की.

'जिस दिन मैं पैदा हुई, मेरी मां को लगा वो नहीं बचेगी. पर वो बच गई, उसके पास पूरे दिन खाने के लिए कुछ नहीं था. मैं भूखे ही बड़ी हुई हूं, पर कोई नहीं. मेरी मां कहती है कि जब मैं उनके पेट में थी, मुझे तब से भूखे रहने की आदत है. अब मैं और मेरी मां दोनों काम करते हैं, हमें भूखा नहीं रहना पड़ता है. हम सूरज निकलने पर काम पर पहुंच जाते हैं. जब शाम को मैं घर लौटती हूं, तो दुखी और हारा हुआ महसूस करती हूं. 100 पत्थर तोड़ने पर मुझे 95 टाका मिलते, लेकिन मैं 70 से ज़्यादा पत्थर नहीं तोड़ पाती. कल एक जादू हुआ, मैंने 100 पत्थर तोड़े और मुझे 95 टाका मिले. एक्स्ट्रा मिले पैसे से मैंने अपने और अपनी मां के लिए Ice Cream ख़रीदी. कल मुझे लगा कि मैं अमीर हूं.'

एक Ice Cream और थोड़े से एक्स्ट्रा पैसों से ये बच्ची कितनी ख़ुश हो गई. हम कई बार अपनी ज़िन्दगी की परेशानियों को ख़ुद से बड़ा कर लेते हैं. हमारे पास जो है, हम उसमें ख़ुश नहीं हो पाते. हमारे पास जो है, उसकी एहमियत करना भूल जाते हैं.

ज़िन्दगी का काम है इम्तिहान लेना और हमारा काम है उस Exam में पूरीय आधी तैयारी से बैठना. तो जो नहीं हुआ या जो हुआ, वो क्यों हुआ इससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, ताकी इस बच्ची की तरह निश्छल हंसी हमारे भी चेहरे पर खिले.