ऑस्कर अवॉर्ड्स के 90वें संस्करण का समापन हो गया है, लेकिन एक बात जो नोटिस करने वाली है, वो ये कि विनर्स की लिस्ट छोड़कर पूरी दुनिया एक स्पीच पर बहस कर रही है. ये स्पीच एकेडमी अवॉर्ड्स 2018 के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का ख़िताब जीतने वाली एक्ट्रेस Frances McDormand की है.

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दरअसल, हॉलीवुड फ़िल्म Three Billboards Outside Ebbing, Missouri के लिए बेस्ट अदाकारा का अवॉर्ड जीतने वाली फ्रांसेस मैकडोरमैंड ने नॉर्मल थैंक्यू स्पीच ना देकर हॉलीवुड इंडस्ट्री के सामने एक सवाल खड़ा किया है.

मैकडोरमैंड ने कहा- इस हॉल में मौजूद सभी लेडीज़ जिन्हें किसी भी कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया है, क्या वो मेरे लिए एक बार अपनी जगह पर खड़ी हो सकती हैं? चाहे वो कोई भी हो लेखक, एक्टर, कोरियोग्राफ़र, प्रोड्यूसर, निर्देशक आदि. देवियों और सज्जनों अाप अपने आस-पास देखिये कितनी कहानियां यहां मौजूद हैं. आप इनसे वक्त निकालकर मिलिए और ये सब आपको अपनी दास्तां बताएंगीं. अंत में मैं आपसे दो शब्दों के साथ विदा लेना चाहूंगी और वो हैं Inclusion Rider.

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Inclusion Rider एक ऐसा शब्द है, जो हॉलीवुड में काम करने वाले प्रत्येक वक्ति अपने कॉन्ट्रेक्ट में फ़िल्म मेकर्स से 50 प्रतिशत विविधता की डिमांड कर सकता है. इससे फ़िल्म में कास्ट और क्रू मेंबर्स के रूप में विविधता उपलब्ध कराई जाती है.

मैकडोरमैंड ने ऐसा कर के हॉलीवुड में मौजूद विविधता की कमी के साथ ही Gender Inequality को लेकर सवाल किया है. उनका कहना है कि इतनी बड़ी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री होते हुए भी यहां महिलाओं के साथ भेदभाव, गोरे काले का फ़र्क जैसी बुराइयां क्यों मौजूद हैं? क्यों इतने वर्षों बाद भी ये सब नहीं बदला है? आखिर क्यों हर कोई इसके बारे में बात करने से कतराता है?

वैसे हॉलीवुड में ये कोई नई बात नहीं है. वहां अकसर ऐसी बातें उठाई जाती रहीं हैं. मैकडोरमैंड के बाद बहुत से हॉलीवुड सेलेब्स ने इस बारे में खुलकर बात की है. Wild और Rambling Rose जैसी फ़िल्मों के लिए दो बार ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हो चुकीं लॉरा डर्न ने हिचकिचाते हुए कहा कि- बदलाव हो रहा है, लेकिन इस मोमेंटम को बरकरार रखने की आवश्यकता है.

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Nowhere Boy और Fifty Shades of Grey जैसी फ़िल्मों के डायरेक्टर सैम टेलर जॉनसन ने कहा कि- कितनी बार इस तरह के सवाल उठाए जाते हैं, उसके बाद सभी सोचने लगते हैं कि शायद अब बदलाव आएगा, लेकिन इसके बाद कोई भी कुछ नहीं करता और सब वैसा के वैसा ही रहता है.

अकेडेमी अवॉर्ड्स के इतिहास में पहली बार किसी महिला क्रोमेटोग्राफ़र का नॉमिनेशन पाने वाली रेचल मॉरिशन ने कहा- कोई मर्द क्यों नहीं इस तरह के सवाल उठाता, आखिर वे भी इस इंडस्ट्री का हिस्सा हैं.

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बेस्ट गीतकार का ख़िताब जीतने वाली एंडरसन लोपेज़ ने कहा कि- एक बार आप सॉन्ग राइटर्स कैटेगरी के नॉमिनेशन पर गौर कीजिए ये ना सिर्फ़ विविध है बल्कि यहां जेंडर इक्वेलिटी 50-50 के करीब है. मैं ऐसा ही दूसरी कैटेगरीज़ में भी देखना चाहती हूं.

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खै़र ये तो बात थी हॉलीवुड की, अब बात करते हैं बॉलीवुड की. क्या आप बॉलीवुड इंडस्ट्री में ऐसा होता देखने की कल्पना भी कर सकते हैं? इसका जवाब है नहीं. हिंदी सिने जगत में शायद ही कभी ऐसा हो पाए. क्योंकि यहां अगर कोई इस तरह से इंडस्ट्री पर सवाल उठाता है, उसका तुरंत बहिष्कार कर दिया जाएगा. और ऐसा हुआ भी है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं कंगना रनौत.

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बॉलीवुड की क्वीन कंगना ने फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद नेपोटिज्म यानि के परिवारवाद के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी. लेकिन लोगों ने न सिर्फ़ उनका विरोध किया, बल्कि कई अवॉर्ड शोज़ में उनका मजाक तक उड़ाया गया था. वैसे भी हम विदेशी जमीन पर बड़े-बड़े अवार्ड शो में बॉलीवुड स्टार्स से डांस कराने के अलावा करते ही क्या हैं. उनसे ऐसी उम्मीद करनी ही बेमानी है. क्यों आपका क्या ख्याल है?