सब छोड़कर सन्यास ले लेंगे, नौकरी में मन नहीं लगता यार... मैं तो हिमालय जाने की सोच रही हूं...

हम अकसर दोस्तों या ऑफ़िस के लोगों से हंसी-मज़ाक में ऐसा कह देते हैं. असल में ऐसा कोई इरादा नहीं होता. मध्य प्रदेश के नीमच के एक जवान दंपत्ति ने ये प्रतिज्ञा ली है कि वे सब छोड़कर, संयास ले लेंगे.

सुमित राठौर और उनकी पत्नी अनामिका, 23 सिंतबर को सूरत के सुधामार्गी जैन आचार्य रामलाल महाराज से सन्यासी बनने की दीक्षा लेंगे. इस युवा दंपत्ति ने अपनी 3 साल की बेटी, इभ्या को छोड़कर सन्यास लेने की सोची है

अनामिका के पिता, अशोक चंडालिया ने कहा,

'मैं अपनी पोती का ध्यान रखूंगा. उनके निर्णय को हम नहीं बदल सकते.'

सुमित के पिता राजेंद्र ने भी दंपत्ति के निर्णय को स्वीकार कर लिया है,

'हमें पता था कि ऐसा कुछ ज़रूर होगा, पर इनती जल्दी इसका अंदाज़ा नहीं था. हमने भी उनके निर्णय को मान लिया है.'

सुमित और अनामिका के रिश्तेदारों के लिए ये कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी क्योंकि जब उनकी बेटी सिर्फ़ 8 महीने की थी, तभी उन्होंने मुनि बनने की इच्छा ज़ाहिर कर दी थी.

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22 अगस्त ने आचार्य रामलाल के सामने दीक्षा लेने की बात रखी. दोनों की शादी को अभी 4 साल हुए हैं. दोनों ने दीक्षा प्राप्ति तक मौन धारण किया है.

अनामिका ने इंजीनियरिंग की है और विवाह से पहले वो नौकरी भी करती थी. सुमित ने भी लंदन से इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट में डिप्लोमा किया है. उन्होंने वहां से अपने परिवार के बिज़़नेस को भी संभाला था.

सुमित के करीबी दोस्त और भाई ने बताया,

'उसके पास वो सब था जो किसी भी आदमी का सपना होता है. उसकी लगभग 100 करोड़ की संपत्ति, प्यार करने वाली बीवी और एक प्यारी सी बच्ची है. पर वो सब छोड़ने को तैयार हो गया. ये एक बहुत बड़ा झटका है.'
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नीमच के जैन कम्युनिटी के सदस्य प्रकाश भंडारी ने कहा,

'पहली बार इतनी कम उम्र के दंपत्ति ने सन्यास लेने का निर्णय लिया है. वो भी तब जब उनकी 3 साल की बेटी है.'

देश में तकरीबन 50 लाख जैन रहते हैं और ये बहुत ही अनुशासित जीवन जीते हैं. ये धर्म बौद्ध धर्म से भी पुराना है.

इसी साल के जून में 17 वर्षीय वर्शील शाह ने 12वीं में 99.9 पर्सेंटाइल स्कोर करने के कुछ हफ़्तों बाद ही संयास लेने का निर्णय लिया. पिछले साल अक्टूबर में 13 वर्षीय अराधना सम्दारिया ने 68 दिनों की तपस्या की थी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई थी.

जैन समुदाय के कुछ लोगों का कहना था कि अराधना ने अपनी इच्छा से तपस्या की थी और उसके उपवास और बुज़ुर्गों द्वारा रखे जाने वाले 'संथारा' में अंतर है.

ये सवाल एक बार फिर उठ रहा है कि धर्म और आस्था के नाम पर अपने अपनों को दुख देना कहां तक जायज़ है?

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