हमारे देश की आत्मा गांवों में बसती है. एक महान नेता ने कहा था कि देश की तरक्की के सूचक शहर नहीं, बल्कि गांव होते हैं. देश की 60 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है और खेती करके जीवन-व्यापन करती है. हमारे गांवों की एक ख़ास बात ये है कि हर गांव कुछ न कुछ कहानी कहता नज़र आता है. लेकिन गांव का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में पिछड़ापन, सुविधाओं का अभाव और साधारण रहन-सहन का ख़्याल कौंध उठता है. लेकिन एक गांव ऐसा भी है, जिसका मुक़ाबला बड़े-बड़े देशों के विकसित शहर भी नहीं कर सकते. इस गांव का नाम है हिवारे बाज़ार गांव, जो महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में है. आपको विश्वास नहीं होगा कि 1250 लोगों की जनसंख्या वाले इस गांव में 60 करोड़पति रहते हैं.

एक समय जहां ये गांव गरीबी और शराबखोरी से परेशान था, आज वहीं आप सीमेंट के मकान और Planned गलियां और साफ़-सुथरी रोड देख कर आप दंग रह जाएंगे. 1995 में जहां इस गांव की प्रति व्यक्ति आय 830 रुपये हुआ करती थी, वहीं आज ये 30,000 रुपये हो गयी है. ये गांव तम्बाकू, शराब, और खुले में शौच मुक्त हो चुका है. इस गांव के 235 परिवारों के हर घर में एक टॉयलेट है. आपको जान कर हैरानी होगी कि 1972 में ये गांव सूखे की चपेट में बुरी तरह बर्बाद हो गया था. यहां के लोगों के लिए दो वक़्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो गया था. लोग इतने परेशान हो गये थे कि दारू पीना शुरू कर दिया था, इसलिए गांव बर्बादी की ओर कदम बढ़ा चुका था. काम-धंधे की तलाश में इस गांव से एक बड़ी संख्या में लोग नज़दीक के शहरों में चले गये.

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतना बदहाल गांव इस मुकाम तक कैसे पहुंचा, तो आपको बता दें इस गांव के विकास के पीछे सबसे बड़ा हाथ यहां के युवाओं का था. लोगों ने किस्मत के भरोसे बैठना छोड़ दिया था. अब उन्हें तलाश थी एक नेता की, इसके लिए उन्होंने पोपटराव पवार को चुना. पवार के पहले फ़ैसले ने गांव वालों की उम्मीद बढ़ा दी थी, पवार ने सरपंच बनते ही गांव के पास के 22 शराब की दुकानों को बंद करवा दिया. इसके बाद उन्होंने बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र के सौजन्य से गरीब गांव वालों को लोन दिलवाया और विकास की योजनायें बनानी शुरू कर दी. पानी की इस गांव में बहुत किल्लत थी, इसलिए पवार ने तुरंत जल-संरक्षण का मैनेजमेंट करवाया और कई टैंको के साथ ही साथ बांध और मेढ़ बनवा डाले. 

इस गांव के 976 हेक्टेयर ज़मीन में से 150 हेक्टेयर पूरी तरह से पत्थर थी. कुल मिलाकर किस्मत भी पवार और गांववालों के साथ नहीं थी. पवार ने इन ज़मीनों पर बबूल के पेड़ लगवा दिए और इस तरह से पथरीली ज़मीन से भी लाखों रुपये आने लगे. लेबर कोस्ट बचाने के लिए एक दूसरे की मदद करने की सलाह दी गई और इस तरह लोगों में एकता का महत्त्व जग गया. बस वित्तीय विकास ही नहीं, पवार ने धार्मिक और सामजिक विकास भी बराबर किया. आपको बता दें कि गांव के इकलौते मुस्लिम परिवार के लिए एक मस्ज़िद बनाई गई.

अब ये गांव इतना आगे निकल चुका है कि दुग्ध उत्पादन और अन्य कई क्षेत्रों में पुरस्कार जीत चुका है. सरकार के आंकड़ों के हिसाब से, अब इस गांव में मात्र तीन परिवार ही BPL से नीचे हैं. गांव ने जल-संरक्षण में भी नेशनल पुरस्कार भी जीता है. गांव में कुवों की संख्या 294 है. पवार के नाम पर अब महाराष्ट्र में कई योजनायें निकाली जा रही हैं.

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अगर हम कहें कि ये गांव भारत का सबसे सम्पन्न और खुशहाल गांव है, तो गलत नहीं होगा. देश के हर गांव को पवार जैसे नेता की ज़रुरत है. इस गांव में भविष्य के हिंदुस्तान की तस्वीर है.

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