वो सुबह गुलाम भारत की सुबह से भी बदतर थी, जब देशवासियों ने इमरजेंसी के बाद का सूरज आंखों में आंसू भरकर देखा था. क्या यही दिन देखने को लाखों लोग कुर्बान हो गए थे? आज से 41 साल पहले यानि 25 जून 1975 को भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशभर में इमरजेंसी लगाई थी. यह समय आजाद भारत का एक काला दौर था. देश ने अभी बमुश्किल मिली आज़ादी का जश्न भी ठीक से नहीं मनाया था, तभी जनता के तंत्र में बिना जनता से पूछे ही इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई. आज़ाद भारत की सुबह देखने की आदत में ढल रहे भारतीय हक्के-बक्के रह गए थे. उस मनहूस आदेश ने लोगों की लिखने, बोलने, कुछ करने की आज़ादी ही ख़त्म कर दी थी. जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी.

पहली महिला प्रधानमन्त्री ने देश को जो कुछ भी अपनी काबिलियत के दम पर दिया, उस पर एक बड़ा काला धब्बा बनकर छा गया आपातकाल. एक ऐसा निर्णय, जिसने हिन्दुस्तानियों के गौरव को उनके देश में ही कुचल दिया. सरकार के सारे विरोधियों को जेल में डाल दिया गया. अखबारों के शब्द हों या ऑल इंडिया रेडियो के कार्यक्रम, सब सरकार की इजाज़त से चलने को बेबस थे. लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया को पंगु बना दिया गया था. जिस आपातकाल को भारत की भोली-भाली जनता पर थोपा गया था, उसे लेकर पूरे विश्व में इंदिरा गांधी को आलोचनाओं को सामना करना पड़ा. उन्हें 'तानाशाह' तक कहा गया. इंदिरा गांधी के चाहने वाले भी उनके इस फैसले को उनके जीवन का सबसे गलत फैसला मानते हैं. इमरजेंसी ने भारत की आत्मा तक को घायल कर दिया था. वो दौर जिन लोगों ने भी देखा, वो उनके जीवन का सबसे बुरा अनुभव रहा.

हम आज आपको 1975 से 1977 के बीच की कुछ फोटोग्राफ्स दिखा रहे हैं, जो भारत के इतिहास के कठिनतम दौर से आपको परिचित करांएगे.

1. इंदिरा गांधी के शासन के दौरान ली गई एक ऐसी फोटो, जो ये दिखाने के लिए काफी है कि वो किस तरह की शासक थीं.

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2. इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से इमरजेंसी की घोषणा देश भर में की थी. उन्होंने विदेशी और आतंकवादी खतरों का हवाला देकर उस वक़्त के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को इमरजेंसी लागू करने के लिए राज़ी कर लिया था.

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3. प्रभावशाली राजनेता और एक्टिविस्ट्स को, चाहे वे कांग्रेस के थे या विरोधी पार्टी के, जिन्होंने भी सरकार के निर्णय को मानने से इंकार किया, सभी को इमरजेंसी शुरू होने के तुरंत बाद जेल में डाल दिया गया. इस अखबार की प्रकाशन तिथि पढ़िए, ये 26 जून का पेपर है.

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4. लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने गलत तरीके से इमरजेंसी लगाने के विरोध में इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की, तो उन्हें रामलीला मैदान में पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटा गया.

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5. अन्य नेताओं की तरह गिरफ्तार होने से बचने के लिए नरेंद्र मोदी ने एक सिख का रूप धारण कर लिया था.

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6. सुब्रमण्यम स्वामी ने भी पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए कुछ ऐसा ही रास्ता अपनाया.

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7. जामा मस्ज़िद के पास बुल्डोज़र ने बहुत से घरों को नष्ट कर दिया गया और उनमें रह रहे कितने मासूम लोग इस दौरान मारे गए, इसकी कोई सही संख्या नहीं बता पाया. क्योंकि मीडिया के हाथ-पैर उस वक़्त बंधे थे.

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8. भारतीय संविधान द्वारा हर नागरिक को दिए गए मौलिक अधिकारों को उस वक़्त ख़त्म कर दिया गया था. इसलिए प्रेस को भी हर खबर छापने की अनुमति नहीं थी. उस वक्त ज़्यादातर लोगों की पहुंच में रहने वाला ऑल इण्डिया रेडियो भी बैन था.

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9. लेकिन उस समय के अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार 'Himmat' के कुछ जांबाज़ पत्रकारों ने अपने उसूलों के दम पर उस ख़तरनाक माहौल में भी रिपोर्टिंग की. 

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10. सफ़दर हाशमी और उनके ग्रुप ने दूसरे कुछ हिम्मती लोगों की तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीने जाने के इस तरीके का नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से विरोध भी किया.

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11. हथकड़ियों में बंधे हुए जॉर्ज फर्नांडिस हैं ये. मुट्ठी बांधकर हाथ को उठाए हुए उनकी ये तस्वीर 21 महीने की लम्बी इमरजेंसी को परिभाषित करती तस्वीरों में से एक है.

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12. प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी द्वारा जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों की नसबंदी भी इस दौरान की गई. लोग इस नसबंदी को कराने के लिए मजबूर थे, उन्हें कोई बचाने वाला नहीं था.

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13. अभिनेत्री सुचित्रा सेन द्वारा अभिनीत फिल्म 'आंधी' को बैन कर दिया गया था. इसमें सुचित्रा ने इंदिरा गांधी का किरदार निभाया था. ये फिल्म 1977 में कांग्रेस सरकार के गिरने के बाद रिलीज़ हो पाई.

14. एक और राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' भी बैन कर दी गई थी.

15. 1977 में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी हटा ली थी और उसके बाद तुरंत आम चुनाव का ऐलान कर दिया. उसके बाद कांग्रेस सरकार को जनता ने जो फैसला सुनाया, उसे तो सभी जानते हैं. कांग्रेस ने अपने इतिहास की सबसे बुरी पराजय देखी थी.

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इसके बाद जब जनता पार्टी सत्ता में आई, तो उसने आपातकाल के दौरान मानवाधिकारों के हनन और हिंसा की जांच के लिए जस्टिस जे.सी. शाह की देख-रख में शाह आयोग का गठन किया. शाह आयोग के सामने इंदिरा गांधी के खिलाफ गवाही देने के लिए कई कांग्रेस नेताओं ने सी. सुब्रमण्यम की खिंचाई की. हालांकि 1980 में ही नई सरकार गिर गई और फिर इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आईं. शायद उस वक़्त देश के पास कोई मजबूत विकल्प नहीं था.

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आपातकाल ने लोगों को यातना, गिरफ्तारी और बेरहमी सी छीन ले गई आज़ादी के दिन दिखाए. वो दिन इतने बदतर थे कि आज की पीढ़ी उसकी कल्पना भी नहीं कर सकती. आपातकाल के वो 21 महीने हमें ये याद दिलाते हैं कि सविधान ने हमें जो आज़ादी दी है, वो हमारे लिए कितना मायने रखती है और हमें उसकी क़द्र करनी चाहिए.