डॉ राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को हुआ था और मृत्यु 12 अक्टूबर 1967 को हो गयी थी. डॉ लोहिया उनका जन्मदिन नहीं मनाते थे क्योंकि 23 मार्च शहीदेआज़म भगत सिंह का शहादत दिवस है. लोहिया आज़ाद भारत के उन कुछ चुनिंदा राजनेताओं में शुमार किए जा सकते हैं जो मौलिक विचारक होने के साथ-साथ देश में मातृभाषा के पक्षधर थे. हालांकि वे हिंदी के अलावा अंग्रेजी और एक और दूसरी भाषा जर्मन के भी जानकार थे. गौरतलब है कि डॉ लोहिया ने उनके डॉक्टरेट की डिग्री जर्मनी के हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी से हासिल की थी.

डॉ लोहिया भारत में गैर-कांग्रेसवाद के शिल्पी थे, और आज़ाद भारत में यह उन्हीं के अथक प्रयास से संभव हो सका कि कभी अपराजेय समझी जाने वाली कांग्रेस सन् 67 तक कई राज्यों में चुनाव हारी. वे देश में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के प्रणेता थे और इस मुद्दे पर वे बेबाक राय रखते थे. उनके लिए स्वभाषा राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान का प्रश्न और लाखों-करोड़ों को हीन ग्रंथि से उबरकर आत्मविश्वास से भर देने का स्वप्न था.

डॉ लोहिया न केवल एक गंभीर चिन्तक थे बल्कि सच्चे कर्मवीर भी थे. वे लोहिया ही थे जो राजनीति की गंदी गली में भी शुचिता व शुद्ध आचरण की बात करते थे. वे एक मात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने उनकी पार्टी की सरकार से खुलेआम त्यागपत्र की मांग की, क्योंकि उस सरकार के शासन में आंदोलनकारियों पर गोली चलाई थी. लोहिया मात्र 57 वर्ष ही जीवित रह सके मगर इतनी कम अवधि में भी वे एक प्रकाशपुंज की तरह भारतीय राजनीति पर अमिट छाप छोड़ गए. डॉ लोहिया उनकी लेखनी, ठेठ देसी ठसक और कर्मवीरता की वजह से सदियों याद किए जाते रहेंगे. तो आइए हम आपको रूबरू कराते हैं स्वतंत्र भारत के सबसे प्रखर व मौलिक राजनेता व चिन्तक के विचारों से जिन्हें याद करना और उन पर चलना पहले की तुलना में और भी ज़रूरी हो गया है...

काम...

हर नागरिक...

चोरी...

समझ...

नारी...

आलोचना...

मकसद...

इंतजार...

समाजवाद...

गांधीवादी...

इतिहास...

बदलाव...

मर्दानगी...

वैधता...

संसद...

धर्म व राजनीति...

आम इंसान...

स्त्री सौंदर्य...

सामंती अंग्रेजी...

सिद्धान्त व पाखंड...

इच्छाएं...

क्रांति...

अब इन बातों और विचारों से शायद ही कोई असहमत हो. और हां क्रांति टुकड़ों में तो कतई नहीं हो सकती. डॉ साहब को हमारी ओर से श्रद्धांजलि व नमन. और हमें-आपको कोशिश करनी होगी कि ये हम इन सारे मूल्यों और वैचारिकी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना सकें...