किसी भी चीज़ के लिए ज़्यादा ख़ुश या दुखी नहीं होना चाहिए. ज़्यादा उत्साह हमेशा खतरनाक होता है, हो सकता है कि कभी आप जिस बात के लिए बहुत खुश हों और वो काम न हो पाए तो आपको बहुत खराब लगेगा? इसलिए ख़ुशी और गम दोनों एक निश्चित मात्रा में ही अच्छे लगते हैं. कभी-कभी तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि हद से ज़्यादा एक्साइटमेंट लोगों की जान ले लेता है. ऐसा ही कुछ हुआ कलाम्बा सेंट्रल जेल के बाहर. साजिद मकवाना जब चार साल का था, तब 1996 में उसके पिता को किसी ज़ुर्म में आजीवन कारावास की सज़ा हो गयी थी. उसके पिता ने इस दौरान न ही ख़ुद को बेक़सूर साबित करने की कोशिश की और न ही पैरोल के लिए अप्लाई किया. 23 साल की सज़ा के बाद हसन को जब को रिहा करने का फ़ैसला किया गया, तो उसके बेटे को बहुत ख़ुशी हुई.

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इस मौके पर वो अपने पिता को लेने के लिए जेल के बाहर पहुंच गया, अपने पिता को बाहर देखने की ख़ुशी में साजिद सातवें आसमान पर था. इस बात की ख़ुशी से वो इतना एक्साइटेड हो गया कि उसे दिल का दौरा पड़ गया और उसकी मौत हो गई.

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जेल सुप्रीटेन्डेंट शरद शेलके ने जब हसन को बाहर लाकर छोड़ा, तो हसन का परिवार उस वक़्त बाहर एक गाड़ी में उसका इंतज़ार कर रहा था. हसन के आने से सबसे ज़्यादा खुश था उसका बेटा साजिद, उसने जैसे ही अपने पिता से बात करनी शुरू की, वैसे ही उसने छाती में दर्द की शिकायत की.अगले ही पल वो नीचे गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई. उसे तुरंत एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाया गया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. साजिद अंधेरी में एक ड्राइविंग स्कूल चलाता था. उसने अपने पिता के जेल से छूटने के बाद शादी करने का मन बनाया था. उसके पिता हसन को 1977 में पुलिस ने एक मरे हुए आदमी के पास से गिरफ़्तार किया था. 1981 में हसन को बेल मिल गई, पर 1996 में उसे हाई कोर्ट ने फिर से उम्र कैद की सज़ा दे दी. पिछले हफ़्ते ही उसे चिट्ठी मिली थी कि 17 जनवरी को उसे रिहा किया जाएगा.

किस्मत का खेल है सब, पिता को आज़ादी मिलते ही बेटा दुनिया छोड़ कर चला गया. अब हसन के कलेजे पर क्या बीत रही होगी, ये तो वही जानता है.

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