कब्रिस्तान, श्मशान या मौत से जुड़ी कोई भी जगह किसी भी आम इंसान के लिए भयावह होती है. वहां से गुज़रने से भी लोग कतराते हैं, पर कोई ऐसा भी है, जिसने कब्रिस्तान को ही अपना घर बना लिया है. उसे समाज में रहने से बेहतर एक कब्रिस्तान में रहना लगता है. हम बात कर रहे हैं मोना अहमद की. 'मोना एक हिजड़ा है.' बस ये एक वाक्य ही काफ़ी है ये समझने के लिए कि उसे ये समाज क्यों नहीं भाता. या फिर कह लें कि वो इस समाज को नहीं भाती.

80 वर्षीय मोना जानती है कि अब तीसरे जेंडर को क़ानून ने मान्यता दे दी है, लेकिन ये भी तो नहीं झुटलाया जा सकता कि समाज ने फिर भी किन्नरों को नहीं अपनाया है.

कब्रिस्तान में मोना के कुछ पड़ोसी भी हैं, जिनमें कुछ सेक्स वर्कर, कब्र खोदने वाले और भिखारी शामिल हैं. इन लोगों को यहां गड़े मुर्दे डराते नहीं. उनकी कब्रों पर धुले कपड़े सुखाना इनके लिए एक आम बात है. मेहंदियां कब्रिस्तान पिछले तीन दशकों से मोना का घर है.

19वीं सदी में एक रहस्यमयी धार्मिक संप्रदाय को जगह देने के लिए ये जगह बनायी गयी थी. आज यहां कब्रिस्तान है और उसमें बसने वाले कुछ मुर्दा और ज़िन्दा लोग हैं.

फ़ेमिनिस्ट लेखक उर्वशी बुटालिया, मोना की दोस्त हैं. उन्होंने बताया कि एक समय पर आम लोगों की दुनिया मोना को भी बड़ी लुभावनी लगती थी, लेकिन अब उन्हें ये नीरस लगने लगी है.
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मोना 1955 में अपने घर से भागी थी. उसने अपनी ज़िन्दगी हिजड़ों के साथ पब्लिक के बीचों-बीच जी है. अब उसे बक्से जैसे कमरों वाले घर किसी जेल जैसे लगते हैं. कब्रिस्तान में बसे इस घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं. वो अपने जैसे और युवाओं की मदद को हमेशा तत्पर रहती है. आम ज़िन्दगी उसे बेहद अकेली लगती है.

कहते हैं हिजड़ों की दुआ ज़रूर लगती है. यही कारण है कि शादी से लेकर बच्चे के जन्म तक, हर अवसर पर उन्हें बुलाया जाता है. उन्हें यहां पैसे दिए जाते हैं. ज़्यादातर लोग इतना ही जानते हैं इनकी ज़िन्दगी के बारे में, लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि दो मिलियन ट्रांसजेंडर ग़रीबी में अपना जीवन बिता रहे हैं.

हर शहर हिजड़ों के इलाकों में बंटा होता है. ये अपने सूत्रों से ख़बर लेते रहते हैं. इनमें घरों में काम करने वाले नौकर, दुकानदार, माली सभी शामिल होते हैं. ये इन्हें बताते रहते हैं कि कहां बच्चा पैदा हुआ है या कहां शादी हो रही है.

ऐसे मौकों से इन्हें अच्छा पैसा मिलता है, लेकिन इन हिजड़ों की टोलियों में सभी हिजड़े शामिल नहीं होते. कई हिजड़े, सेक्स वर्कर बन या भीख मांग कर ही अपना गुज़ारा करते हैं.

1980s में मोना ने कब्रिस्तान में घर ये कह कर ले लिया था कि यहां मौजूद कुछ कब्रें उसके परिजनों की हैं. कई बार ऐसा भी हुआ कि दरवाज़े खुले रखने के कारण मोना के घर चोरियां हुईं, लेकिन फिर भी उसने कभी इन्हें बंद नहीं किया. जो भी ट्रांसजेंडर उसके पास सलाह के लिए आता है, वो उसे कभी निराश नहीं करती.

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