एक मशहूर लेखक, जो हाईवे पर तूफ़ान की तरह दौड़ती ट्रकों पर बवाल शायरियां लिखा करते थे, कुछ दिनों से बेरोज़गारी की मार झेल रहे थे. अचानक उन्हें किसी अख़बार में एक अच्छी कंपनी में कॉन्टेंट लेखक के पद के लिए दिया गया इश्तेहार दिख गया. फिर क्या था, अपना पेंटिंग का बक्सा उठा कर निकल पड़े लेखक महोदय ऑफिस की ओर.

दरवाजे पर पहुंचते ही उनके अन्दर की क्रिएटिविटी उन पर हावी हो चुकी थी. गेट पर लिखा था "NO ADMISSION, WITHOUT PERMISSION". उनको लगा कि ये शायरी उनका कोई सहोदर भाई पूरा नहीं कर पाया है, फिर लेखक अपने पिटारे से ब्रश और पेंट निकाल कर उसको पूरा करने में जुट गए. आधे घंटे के कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने उसे कुछ यूं पूरा किया.

वहां गेट पर तैनात गार्ड ने फिर लेखक को उस बात का पुरस्कार दिया, अपने गालों पर पुरस्कार लिए जब जनाब अन्दर पहुंचे, तब उन्हें इंतज़ार करने को कहा गया. HR वाली मैडम ने जब उनसे उनका नाम जानने की इच्छा जताई तब उन्होंने जवाब दिया कि-

बेईज्ज़ती का दौर पूरा कराने के बाद जब वो इंटरव्यू के लिए अंदर पहुंचे तब 5 लोगों की पैनल को देख कर बड़े ही अदब से उन्होंने अपना परिचय दिया-

घूरती नज़रों से जब पैनल ने उनसे उनके अनुभव के बारे में पूछा, तो लेखक महोदय ने यादों के झरोखों पर नज़र फिराते हुए कहा-

लेखक के जवाब ने पैनल में बैठे लोगों के दांत खट्टे कर दिए. फिर भी हिम्मत जुटा कर उनमें से एक ने पूछ लिया कि आप अपने लिए Competition किसको मानते हो. लेखक ने इसका भी जवाब दिया इतने ही अदब से दिया-

इस बार सब डिप्रेस हो चुके थे लेखक महोदय से, उनसे आखिरी प्रश्न ये पूछा गया कि वो इस काम के कितने पैसे लेंगे? लेखक की ज़ुबान से एक और कविता तीर की तरह निकल पड़ी-

पैनल वालों का अब धैर्य का बांध टूट चुका था, उनकी सारी आशाएं लेखक की कविताओं में डूब के मर चुकी थी. बहरहाल उन्होंने लेखक महोदय को कहा-

Illustration by : Puneet Gaur Barnala