सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले की वजह से 'लिव-इन रिलेशनशिप' फिर से चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट ने एक केस की सुनवाई में एक एतिहासिक फ़ैसला दिया, जिसके अनुसार दो बालिग बिना शादी की उम्र (लड़की 18, लड़का 21) को पार किए भी साथ रह सकते हैं. ये मामला पसंद करने के अधिकार से जुड़ा है, जो कि लिव-इन रिलेशनशिप को क़ानूनी मान्यता देता है.

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ये फ़ैसला एतिहासिक क्यों है?

जिस समाज में अन्तरजातीय विवाह बड़ी बात होती है, जहां घर वालों की अनुमती के बिना शादी करने पर जोड़ों की हत्या कर दी जाती है, जहां मकान मालिक किरायेदार को घर देने से पहले उसका मैरिटल स्टेटस पूछते हैं, जहां होटल वाले भी दो बालिग को शादीशुदा होने पर ही कमरा देते हैं, जहां एंटी-रोमियो स्क्वॉड के दम पर सरकारी रूप से मॉरल पोलिसिंग को बढ़ावा दिया जाता है, जहां मट्रो में अगर एक लड़का और लड़की एक दूसरे से गले मिलें, तो आस-पास के लोगों की आंखें लाल हो जाती हैं.

वहां कोई लिव-इन की बात भी कर ले, तो समाज के लोग पहाड़ उठा लेते हैं. बदलाव की रेस में जो समाज इतनी पीछे चल रहा है, उसके लिए सुप्रीम कोर्ट इस तरह के प्रोग्रेसिव फ़ैसले लेती है, तो उसे बेशक एतिहासिक माना जाएगा. हालांकि कोर्ट ने पहले भी ऐसे कई फ़ैसले लिए हैं, जो किसी न किसी रूप में लिव-इन रिलेशनशिप के हक़ में जाते हैं और उसे जायज़ ठहराते हैं.

सिर्फ़ सेक्स नहीं है लिव-इन-रिलेशनशिप

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दहेज, घरेलु-हिंसा, मैरिटल-रेप, लैंगिक समानता, ऑनर किलिंग जैसी कई गंभीर समस्याओं का एक समाधान है- लिव-इन रिलेशनशिप. पूर्ण समाधान नहीं भी, तो भी इसे एक आशावादी कदम माना जाए. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप में उपर्युक्त समस्याएं नहीं होती हैं. किंतु लिव-इन रिलेशनशिप से शादी में तब्दील हुई शादियों की तलुना अगर अन्य शादियों से की जाए, तो आंकेड़े लिव-इन रिलेशनशिप को ही बेहतर बताएंगे.

अगर 'लिव-इन' शादी की शक्ल न ले, तब भी एक प्रोग्रेसिव समाज के निर्माण की ख़ातिर हमें इसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए. यही सही वक्त है, जब समाज में स्थापित लिव-इन से जुड़ी ग़लत धारणाओं को तोड़ने की शुरुआत की जाए. अधिकांश लोग यही समझते हैं कि लिव-इन में रहने का मतलब है शादी से पहले सेक्स (हालांकि इसमें भी कोई बुराई नहीं है और क़ानूनी तौर पर जायज़ है). यहां हमें समझने की ज़रूरत है कि लिव-इन का मतलब सिर्फ़ सेक्स नहीं होता. कई बार लोग भावनाओं में बह कर अपने साथी को बिना करीब से जाने शादी कर लेते हैं. शादी के बाद जब उनका अपने पार्टनर के व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं से सामना होता है, तब उन्हें अपने फ़ैसले पर मलाल होने लगता है. अगर वही Couple प्यार के बाद कुछ वक्त लिव-इन में गुज़ारता, तो एक-दूसरे को समझने का ज़्यादा मौका मिलता.

लिव-इन उन Couples के लिए भी एक अच्छी व्यवस्था है, जो साथ रहना चाहते हैं लेकिन आर्थिक मजबूरी या करियर की वजह से शादी नहीं कर सकते. लिव-इन की प्रकृति की वजह से पार्टनर के प्रति इज़्ज़त और एक-दूसरे के प्रति समानता का भाव बढ़ जाता है.

हमारे समाज की एक और चिंता है. अगर लिव-इन में रहने के बाद लड़के ने लड़की को छोड़ दिया, तो फिर उसे कौन अपनाएगा. हमारी इस सोच की वजह से भी आधी आबादी की तरक्की रुकी हुई है. औरत की सेक्स-लाइफ़ को हमने परिवार और समाज के मान-सम्मान से जोड़ दिया है. महिलाओं के पैर कथित संस्कार की बेड़ियों से जकड़े हुए है.

क़ानून क्या कहता है?

देश में पहली बार लिव-इन का मुद्दा 1978 में सामने आया था. तब उसे क़ानूनी रूप से मान्यता मिल गई थी. हालांकि अभी तक लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कर कोई ठोस और स्पष्ट क़ानून नहीं बनाया गया है. अन्य क़ानून और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर ही इसकी सुनवाई की जाती है. विभिन्न क़ानूनों और अधिकारों के तहत इसे जायज़ माना गया है.

इन बातों का जानना ज़रूरी है-

नैतिकता के आधार पर लिव-इन-रिलेशनशिप को नकारना समयानुकूल व्यवहार नहीं माना जाएगा. ज़रूरत है कि हम रिश्तों को देखने का नज़रिया बदलें, उनको नई परिभाषा दें. जिसमें सामाजिक तौर पर पुरूष-महिला के पास समान अधिकार हों. रिश्तों की बुनियाद प्यार और आपसी सहमति पर रखी जाएं.

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