बॉलीवुड में हर साल सैकड़ों फ़िल्म्स रिलीज़ होती हैं कुछ सुपरहिट होती हैं, तो कुछ सुपरफ़्लॉप. वैसे देख जाए तो बॉलीवुड में केवल ग्लैमर, रोमांस, एक्शन या कॉमेडी आधारित फ़िल्में या यूं कह सकते हैं कि कमर्शियल फ़िल्म्स बनती हैं. लेकिन साल 2017 हिंदी सिनेमा के लिए काफ़ी अलग रहा. इस साल बॉलीवुड में कई ऐसी फ़िल्में बनी जिनमें महिलाओं की आज़ादी की बात की गई तो वहीं सामाजिक मुद्दों को भी उठाया गया, तो कुछ लीक से हटकर फ़िल्में बनाई गईं, जिन्होंने लोगों का ध्यान खींचा. मतलब कि साल 2017 कई मायनों में फ़िल्म जगत के लिए स्पेशल रहा.

अब जब साल 2017 ख़त्म होने की कगार पर है, तो हम आपके लिए ले आये हैं इस साल में रिलीज़ हुई लीक से हटकर फ़िल्मों की एक झलक.

1. शुभ मंगल सावधान

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आयुष्मान खुराना और भूमि पेडनेकर अभिनीत 'शुभ मंगल सावधान' ने आज के युवाओं का ध्यान एक ऐसे मुद्दे की ओर केंद्रित किया जिसके बारे में लोग जल्दी बात करना नहीं चाहते हैं. ये फ़िल्म मर्द की मर्दानगी से जुड़े सवालों को हल्के-फुल्के अंदाज में छूती है. फ़िल्म में आजकल की दौड़भाग भरी ज़िन्दगी में स्ट्रेस के चलते लड़कों के बीच सेक्सुअल प्रॉब्लम और उनसे शादी करने वाली लड़कियों की समस्याओं को खूबसूरती के साथ मजेदार अंदाज में पेश किया है.

2. हरामखोर

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फ़िल्म हरामखोर की कहानी मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक की है, जो काफ़ी रंगीन मिज़ाज का है और वो शादीशुदा है. पर उसको अपनी 15 साल की स्टूडेंट से प्यार हो जाता है. पूरी फ़िल्म एक स्कूल टीचर और नाबालिग स्टूडेंट के बीच पनपते नाजायज़ रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती हुई आखिर में बेहद खतरनाक मोड़ पर ख़त्म होती है. 'देव डी' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' से अपनी अलग पहचान बना चुके डायरेक्टर श्लोक शर्मा ही 'हरामखोर' के लेखक और निर्देशक हैं. वैसे तो ये फ़िल्म 3 साल पहले यानी कि 2014 में रिलीज़ होनी थी लेकिन इसकी प्रॉडक्शन कंपनी ने भारत में इस फिल्म को रिलीज़ करने से पहले फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाने का फैसला किया. 'हरामखोर' ने लॉस ऐंजिलिस फिल्म फेस्टिवल की 'इंडिया कैटेगिरी' में अवॉर्ड हासिल करने के साथ कई और फेस्टिवल में अवॉर्ड जीते. न्यू यॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और श्वेता त्रिपाठी को इसके लिए बेस्ट ऐक्टर और ऐक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला. वहीं, इंडियन बॉक्स ऑफिस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पायी.

3. टॉयलेट: एक प्रेम कथा

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अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर अभिनीत फ़िल्म टॉयलेट: एक प्रेम कथा का निर्देशन श्री नारायण सिंह ने किया है. वैसे तो ये एक हास्य-व्यंग्य फ़िल्म है, लेकिन अपने व्यंगों के साथ ये ग्रामीण इलाकों में स्‍वच्‍छता के महत्‍व जैसे गंभीर मुद्दे पर प्रकाश डालती है. 11 अगस्त, 2017 को रिलीज़ हुई ये फ़िल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'स्‍वच्‍छ भारत अभियान' से प्रेरित है. इसमें खुले में शौच जैसे मुद्दे को बेहतरीन अंदाज़ में पेश किया गया है.

4. हिंदी मीडियम

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साकेत चौधरी द्वारा निर्देशित 'हिंदी मीडियम' आज के टाइम में बच्चे के स्कूल एडमिशन के दौरान आने वाली दिक्कतों को बखूबी दर्शाती है. फिल्म की कहानी ऐसे पेरेंट्स के इर्द-गिर्द घूमती है जिनके पास अथाह पैसा है लेकिन वो इंग्लिश नहीं बोल पाते है, जिस कारण उनके बच्चे को कान्वेंट स्कूल में दाखिला नहीं मिल पा रहा है. इस फ़िल्म के माध्यम से साकेत चौधरी ने वर्तमान की एक गंभीर समस्या को बेहतरीन ढंग से परदे पर उतारा है. ये आज की सच्चाई है कि इंग्लिश मीडियम में बच्चे को पढ़ाना आज के समय में एक ‘स्टेटस सिम्बल' बन चुका है.

5. डेथ इन गूंज

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तनुजा, विक्रांत मैसी, कल्कि कोचलीन, गुलशन देवैया, रणवीर शौरी, ओम पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों से सजी इस फ़िल्म का निर्देशन बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बना चुकीं कोंकणा सेन शर्मा ने किया है. बंगाल की पृष्ठभूमि पर बनी पौने दो घंटे की इस फ़िल्म में किसी एक भाषा पर फोकस नहीं किया गया है. फ़िल्म का कोई पात्र इंग्लिश में बात करता है तो कोई ठेठ हिंदी में. फ़िल्म की कहानी 1979 के वक़्त की है, जिसमें मिस्टर एंड मिसेज बख्शी (ओम पुरी और तनुजा) और उनके कुछ रिश्तेदार मुख्य किरदार हैं. वैसे तो ये फ़िल्म एक ख़ास क्लास के लिए ही बनी है, लेकिन अगर आप लीक से हटकर बनी फिल्मों को देखने का शौक रखते हैं तो आपको एक बार ज़रूर देखनी चाहिए ये फ़िल्म.

6. Maroon

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'Maroon' एक साइको थ्रिलर फ़िल्म है जिसे एक ही लोकेशन पर फ़िल्माया गया है. इस फ़िल्म से पुलकित ने फ़िल्म निर्देशन में कदम रखा. फ़िल्म में एक धोखबाज पत्नी के गायब हो जाने के बाद उसके पति की स्थिति को बख़ूबी बयां करती है. पत्नी के गायब होने के बाद वो कैसे दुनिया के सामने एक नायक के रूप में आता है. फ़िल्म के मुख्य किरदार में मानव कौल ने अपने अभिनय के जान डाल दी है.

7. Trapped

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'लूटेरा' और 'उड़ान' जैसी बेहतरीन फ़िल्मों का निर्देशन कर चुके विक्रमादित्य मोटवानी ट्रैप्ड के साथ एक बार फिर एक अलग सब्जेक्ट पर फिल्म बनाई है. फ़िल्म की कहानी मुंबई के रहने वाले बैचलर जो नया घर लेने के चक्कर में फंस जाता है. एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में बंद हो जाता है, जहां ना पानी है और ना ही बिजली, ऐसे में वो कैसे वहां से बाहर निकलता है, इसी की कहानी है 'Trapped'. फ़िल्म में राजकुमार राव ने अपने दमदार अभिनय का एक बार फिर से लोहा मनवाया है. फ़िल्म का सिंपल प्लॉट, एक भी गाने का न होना, बिना इंटरवल, और अच्छी सिनेमेटोग्राफी आपको फ़िल्म देखते वक़्त ब्रेक लेने का मौक़ा नहीं देगा. फ़िल्म का सिंगल किरदार जो 102 मिनट तक लगातार आपको स्क्रीन पर दिखाई देगा पर आप बोर नहीं होंगे क्योंकि आप उसकी मनः स्थिति से जुड़ाव महसूस करेंगे. इसलिए अगर आपने अभी तक ये फिल्म नहीं देखी है तो ज़रूर देखिये.

8. लिपिस्टिक अंडर माई बुरखा

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इसी साल रिलीज़ हुई 'लिपिस्टिक अंडर माई बुरखा' को काफ़ी विवादों का सामना करना पड़ा क्योंकि फ़िल्म महिलाओं की आज़ादी की बात करती है. ये चार अलग-अलग उम्र की महिलाओं की कहानी है, जो अपनी ज़िंदगी को बिंदास अंदाज़ में अपने मुताबिक जीना चाहती हैं. मगर समाज के कथित ठेकेदार अलग-अलग रूप में बार-बार उनके रास्ते का रोड़ा बनकर खड़े हो जाते हैं.

9. पिंकी ब्यूटी पार्लर

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'पिंकी ब्यूटी पार्लर' जैसा कि फ़िल्म के नाम से पता चल रहा है कि इसकी कहानी ब्यूटीपार्लर और ज़्यादा खूबसूरत दिखाई देने की लड़कियों की चाहत पर आधारित है. फ़िल्म दो बहनों की कहानी है, जो अपने चेहरे का रंग बदलने की ख्वाहिश रखती हैं. इसमें एक बहन सांवले रंग के कारण लोगों के ताने सुनती है और दूसरी बहन अपने गोर रंग के कारण ‘खूबसूरती’ का खिताब जीतती है. फ़िल्म के प्रमुख कलाकारों अक्षय सिंह, खुशबू गुप्ता और सुलगना पानीग्रही ने अपने-अपने किरदारों में जान डाल दी. ये एक मर्डर मिस्ट्री है. बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में बनारस की फ़ेमस लोकेशंस को बहुत खूबसूरती के साथ दिखाया गया है.

10. न्यूटन

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फ़िल्म का मुख्य किरदार न्यूटन कुमार उर्फ नूतन कुमार सरकारी नौकरी में है और उसकी अपनी अलग ही दुनिया है. वो अपनी नौकरी को पूरी श्रद्धा के साथ करता है और समय का पाबन्द है. फ़िल्म की असला कहानी तब शुरू होती है जब न्यूटन कुमार को छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित एरिया में चुनावी के दौरान अधिकारी बनाकर भेजा जाता है. ये ऐसा इलाका है जहां माओवादियों का खौफ है और माओवदियों ने चुनाव का पूरी तरह से बॉयकाट किया हुआ है. कैसे न्यूटन लोगों को वोट देने के लिए तैयार करता है, कैसे अपनी ड्यूटी निभाता है इसकी की जद्दोजहद है फ़िल्म न्यूटन. फ़िल्म को भारत की ओर से ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भी भेजा गया था. हालांकि, फ़िल्म को इन अवॉर्ड्स में नामांकित नहीं किया गया. लेकिन पौने दो घंटे की फ़िल्म देश की चुनाव प्रणाली , सरकारी अफ़सरों की सोच और सिक्यॉरिटी फ़ोर्स के नज़रिये के बारे में सोचने पर मजबूर करती है. राजकुमार राव की एक्टिंग की इसमें जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.

11. सीक्रेट सुपरस्टार

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अद्वैत चंदन द्वारा निर्देशित फ़िल्म सीक्रेट सुपरस्टार में घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की समस्या को दिखाया गया है. फ़िल्म की कहानी बड़ोदरा की रहने वाली लड़की की है, जो एक सिंगर बनना चाहती है. मगर वो अपने पापा से डर्टी है और अपने सपने के बारे में पापा को कुछ बता नहीं पाती. वहीं उसकी मां अपनी बेटी के सपने को पूरा करवाना चाहती है. वो लड़की कैसे अपने सपने को पूरा करती हैं और इसमें उसको किन-किन समस्याओं का सामना करती है इसी के इर्द-गिर्द घूमती है पूरी फ़िल्म. इसमें आमिर खान, जायरा वसीम, मेहर विज, राज अर्जुन प्रमुख भूमिकाओं में नज़र आये हैं. ये सभी किरदार आपको रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जुड़ते दिखाई देंगे. कभी हंसाने तो कभी रुलाने वाली ये फ़िल्म एक मैसेज देती है कि सपनों पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए.