बच्चों की ज़िन्दगी कितनी ज़्यादा आसान होती थी. सुबह उठो, स्कूल जाओ, घर आओ, खेलो, पढ़ो और सो जाओ. पहले के मुक़ाबले आजकल के बच्चों की ज़िन्दगी ज़्यादा मुश्किल हो गई है. खेल के मैदान के लिए अब बच्चों में झगड़े नहीं होते, न ही घरों के शीशे तोड़ने के न थमने वाले सिलसिले अब चलते हैं. जब हम छोटे थे तो मोहल्ले भर के बच्चे गुट बनाकर खेलते थे.

तब वीडियो गेम्स तो थे, पर हमें मिट्टी में लोटने की ज़्यादा आदत थी.

इसके अलावा बचपन की एक और चीज़ थी, जो लगभग हर बच्चे को बहुत अज़ीज़ थी, वो थी 'कॉमिक्स'. कोर्स की किताबे चाहें एक तरफ़ पड़ी रहें, पर उन पतली-पतली रंगीन कुछ पन्नों को पाकर हम बहुत ख़ुश हो जाते थे. कॉमिक्स की अदला-बदली, पक्की दोस्ती की निशानी भी थी. फिर किताबों के बीच में कॉमिक्स रखकर पढ़ना भी था.

नागराज, सुपरकमांडो ध्रुव, चाचा चौधरी, अमर चित्र कथा. बाकी सब कॉमिक्स से हमारी कल्पनाओं को पंख मिलते, पर अमर चित्र कथा ज़रा अलग कॉमिक्स थी.

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अमर चित्र कथा से हमारा ज्ञान भी बढ़ता था. देश और दुनिया की कई हस्तियों और घटनाओं से रूबरू कराने के श्रेय इसी कॉमिक्स को जाता है. अमर चित्र कथा के साथ लगाव कुछ यूं था कि पुरानी कॉमिक्स को बाइंड करवाकर लोग आने वाली पीढ़ी के लिए सहेज कर भी रखा करते थे.

अमर चित्र कथा के रचयिता हैं, अनंत पाई. 17 सितंबर, 1929 में कर्नाटक में जन्म अनंत पाई ने सिर्फ़ 2 साल की ही उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था. बहुत ही कम उम्र में उन्हें साहित्य से प्यार हो गया. पत्रकार बनना चाहते थे पर बड़े भाई के कहने पर इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया, पर मशीनों का साथ रास नहीं आया और इंजीनियरिंग छोड़ दी.

बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पत्रकार के तौर पर काम शुरू किया, जहां वो इंद्रजाल कॉमिक्स में काम करते थे.

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1967 में नौकरी छोड़ दी. उसी साल दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम देख रहे थे, क्विज़ प्रोग्राम. अनंत अंकल ने देखा कि भारत के बच्चे ग्रीक संस्कृति, इतिहास से जुड़े सवालों के जवाब आसानी से दे रहे थे पर अपने देश के महाकाव्य, 'रामायण' से जुड़े सवाल का जवाब नहीं दे पा रहे थे.

इस घटना ने अनंत को काफ़ी परेशान कर दिया और उन्होंने एक ऐसी कॉमिक्स सीरिज़ निकालने की ठानी जो भारतीय बच्चों को भारत से रूबरू करवाएगी. ये कॉमिक्स थी, 'अमर चित्र कथा'.

जिन बच्चों को सफ़ेद पन्नों पर काली स्याही वाली कहानी की किताबें भी नहीं जमती थीं, उनके लिए 'अमर चित्र कथा' सपनों जैसी ही तो थी.

बच्चों के इतने चहेते थे अनंत कि उन्हे सब प्यार से 'अंकल पाई' कहते थे.

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नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें कई पब्लिशिंग हाउसेज़ के चक्कर काटे पर हर तरफ़ से उन्हें निराशा ही हाथ लगी. बहुत मेहनत के बाद अंकल पाई ने इंडिया बुक हाउस के जी. एल. मिरचंदानी ने 'अमर चित्र कथा' पर दांव लगाया.

शुरुआती सालों में अमर चित्र कथा को बहुत नुकसान झेलना पड़ा. स्कूल कॉमिक्स बुक्स को ख़रीदने से मना कर देते. किताबों की दुकानें भी इस कॉमिक्स की तरफ़ रूखा रवैया ही दिखाती.

इस समस्या का समाधान भी अंकल पाई ने निकाला. उन्होंने दिल्ली के एक स्कूल में एक Experiment किया. इस Experiment में छात्रों के एक दल को अमर चित्र कथा से इतिहास पढ़ाया गया और दूसरे दल को आम तरीके से पढ़ाया गया. इसके बाद दोनों ही दलों के छात्रों के इम्तिहान लिये गये. परिणाम पर किसी को विश्वास नहीं हुआ क्योंकि अमर चित्र कथा से जिन छात्रों ने पढ़ा था, उन्होंने ज़्यादा सीखा था.

इसके बाद अमर चित्र कथा ने तेज़ी से सफ़लता की सीढ़ियां चढ़ी. अंकल पाई ने 'रंग रेखा' भी शुरू की. 1980 में अंकल पाई बच्चों की मैगज़ीन 'Tinkle' लेकर आएं. इस मैगज़ीन में क्विज़, कॉन्टेस्ट तो थे ही, इसके अलावा इतिहास, भूगोल, विज्ञान की कहानियां भी थी.

इस मैगज़ीन में बच्चों के ख़तों का जवाब अंकल पाई के नाम से ही देते थे.

आज टीवी, वीडियो गेम्स और अन्य तकनीक की भीड़ के बावजूद अमर चित्र कथा की सालाना 100 मिलियन कॉपीज़ बिकती हैं.

अंकल पाई आज हमारे बीच नहीं हैं, 24 फरवरी 2011 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया, पर हम भारतीय बच्चों को कहानियों और कॉमिक्स से रूबरू करवाने का पूरा श्रेय उन्हें ही जाता है.