उर्दू के मशहूर शायर रसीद अहमद सिद्दीकी ने एक बार कहा था कि 'हम हिंदुस्तानियों को मुगलों का हमेशा शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें मिर्ज़ा ग़ालिब, उर्दू ज़बां और ताजमहल जैसी तीन ख़ूबसूरत चीज़ें दीं'. ये तीनों ही चीज़ें अलग-अलग होती हुए भी आखिर में मिर्ज़ा ग़ालिब से ही जुड़ती हुई दिखाई देती हैं.

अब जैसे उर्दू को ही ले लीजिये, जिसके अल्फ़ाज़ों को एक सिरे में पिरोकर मिर्ज़ा ने एक से एक ख़ूबसूरत ग़ज़लें कहीं. वहीं ख़ूबसूरत ताजमहल को भी बनाने के लिए उसी शहर को चुना गया, जिस शहर के रहने वाले ख़ुद मिर्ज़ा ग़ालिब भी थे. कुल मिला कर मुग़ल काल की तीनों ख़ूबसूरत चीज़ें एक ही शख़्स मिर्ज़ा ग़ालिब के ही इर्द-गिर्द घूमती हुई दिखाई देती है. मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी बेशक ख़ूबसूरत थी, पर उनकी निजी ज़िंदगी बिलकुल इसके उलट थी. बाहर से भले ही ख़ूबसूरत दिखाई देती थी, पर अंदर झांकने पर आपको मजबूरी, लाचारी से भरा एक ऐसा शख़्स नज़र आएगा, जिसने कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. या यूं कहिये कि तमाम तरह के संकटों के बावजूद अपने शौक के लिए जिया. आज हम आपके लिए इन्हीं मिर्ज़ा ग़ालिब से जुड़े कुछ ऐसे किस्से लेकर आये हैं, जिनके बारे में शायद ही किसी ने कुछ लिखा हो.

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क़िस्सा 1

आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर अदबी इंसान थे और खुद भी शेर-ओ-शायरी का शौक रखते थे. हर शाम उनके दरबार में मुशायरे का जमावड़ा लगता था, जहां ग़ालिब के साथ-साथ उस समय के मशहूर शायर ज़ौक़ भी शिरकत किया करते थे. माना जाता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच एक ज़बानी जंग थी, जिसे वो कभी एक-दूसरे पर जाहिर नहीं होने देते थे, पर मौका मिलने पर खिंचाई करने से नहीं चूकते थे.

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एक बार ग़ालिब अपने कुछ दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर ठाठ-मठौली कर रहे थे कि ज़ौक़ साहब पालकी में बैठे वहां से गुज़रे. ज़ौक़ को आता देख मियां ग़ालिब ख़ुद को रोक नहीं पाए और तंज में एक शेर कहा कि:

'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता'

हालांकि उस समय ज़ौक़ ने मियां ग़ालिब को कुछ नहीं कहा, पर इस तंज की शिकायत उन्होंने बहादुरशाह ज़फर से कर दी. इसके साथ ही उन्होंने ग़ालिब के नाम शाम की दावत और मुशायरे के लिए न्यौता भी भिजवा दिया. असल में इस न्यौते के ज़रिये ज़ौक़ ग़ालिब को बादशाह सलामत के सामने बेज्ज़त करना चाहते थे.

ग़ालिब को भी इस बात की भनक लग चुकी थी, पर वहां जाना मियां ग़ालिब के लिए गले की ऐसी फ़ांस बन चुकी थी, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता था. आख़िरकार मियां ग़ालिब मुशायरे में पहुंचे उनके पहुंचते ही बादशाह ने सवाल दागा कि आपने 'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता' कह कर ज़ौक़ साहब पर तंज कसा? चूंकि ज़ौक़ बादशाह के उस्ताद भी थे इसलिए मिर्ज़ा पहले घबराये और जान बचाने के लिए कह दिया कि ये उनकी ग़ज़ल का एक मिसरा था. मिसरा ग़ज़ल के एक हिस्से को कहते हैं.

इस पर बादशाह ने मिसरे को पूरा करने को कहा. अपनी ही बात में ख़ुद को फंसता देख मियां मिर्ज़ा ने मिसरे को कुछ ये कह कर पूरा किया कि

'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता,
वगर न शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है'

इस बात को ज़ौक़ अच्छे से समझते थे कि मिर्ज़ा झूठ बोल रहे हैं इसलिए ग़ालिब को उनके ही जाल में फंसाने के लिए उन्होंने खुद ही इसकी तारीफ़ की और ग़ज़ल को पूरा करने को कहा.

ग़ालिब ने भी हार नहीं मानी और जो ग़ज़ल सुनाई, वो कुछ इस तरह थी कि:

'हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है'

क़िस्सा 2

दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी के उस्ताद बनने वाले थे ग़ालिब.

1840 के आस पास का वक़्त था मुग़ल सल्तनत आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रहा था. ऐसे में ग़ालिब का भी वजीफ़ा बंद कर गया था, जिसकी वजह से ग़ालिब के हालत भी पस्त चल रहे थे. उन दिनों ब्रिटेन की तरफ़ से मिस्टर थॉमस दिल्ली के सचिव नियुक्त किये गए थे, जो मिर्ज़ा की शायरी को काफ़ी पसंद किया करते थे.

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मिर्ज़ा ग़ालिब के हालातों के बारे में जब उन्हें पता चला, तो उन्होंने ग़ालिब के लिए दिल्ली कॉलेज (आज का ज़ाकिर हुसैन कॉलेज) में फ़ारसी के अध्यापक की नियुक्ति की सिफ़ारिश कर दी. ग़ालिब के बारे में आपने सुना ही होगा कि मुफ़लिसी में रहने के बावजूद वो बड़े ही शान-ओ-शौकत से रहा करते थे. यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ और वो पालकी पर चढ़ कर अध्यापक पद के इंटरव्यू के कॉलेज पहुंचे. कॉलेज पहुंचने पर ग़ालिब ने देखा कि यहां कोई उनके स्वागत के लिए नहीं आया, तो गुस्सा होकर बिना इंटरव्यू दिए ही वापस आ गए.

क़िस्सा 3

हालांकि गरीबी के दिनों में ग़ालिब के घर में खाने के लाले पड़े हुए थे, पर जुआ खेलने उनका शौक अपनी जगह था, जिसके लिए वो समय और पैसे का जुगाड़ कर ही लेते थे. उनके इस शौक की वजह से ग़ालिब को दो बार पुलिस वालों ने भी पकड़ा. एक दफ़ा, तो जज ने ग़ालिब को दो साल के कैद की सज़ा भी सुनाई. हालांकि शहर में ग़ालिब की पहचान बड़े-बड़े लोगों से थी, जिसकी सिफ़ारिश से उन्हें तीन महीने बाद ही छोड़ दिया गया था.

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ख़ैर क़िस्से बने ही सुनाने के लिए हैं. आज जब ग़ालिब हमारे बीच नहीं हैं, तो यही क़िस्से उनकी यादों को ज़िंदा किये हुए हैं.

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