इन्सान अपने भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है. उसकी इसी प्रकृति की वजह से आज टीवी चैनलों और अख़बारों में भविष्य और समस्याओं का समाधान बताने वाले बाबाओं का बिज़नेस चल रहा है. बहुत से लोग रोज़ाना सुबह उठकर सबसे पहले टीवी या अख़बार में अपना राशिफल देखते हैं और उसमें बताई गई बातों के अनुसार अपना दिन भर का काम करते हैं. लेकिन एक सामान्य सा प्रश्न है-

अगर इन्सान को सचमुच उसका भविष्य पता चल जाए, तो क्या वो सबकुछ ठीक कर लेगा? क्या तब उसकी ज़िन्दगी अभी के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी होगी?

महाभारत की इस कहानी से शायद आपको इस प्रश्न का जवाब मिल जाए

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कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का युद्ध हो रहा था. सभी लोग पक्ष- विपक्ष में बंट गए. तब उडुपी के राजा ने निष्पक्ष रहने का फ़ैसला किया. उन्होंने न कौरवों को चुना न पांडवों को, बल्कि कृष्ण से उन्होंने एक अलग ही ज़िम्मेदारी मांग ली. उन्होंने कहा कि वो दोनों पक्षों के योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था करेंगे. युद्ध कब तक चलेगा यह निश्चित नहीं था. लाखों लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी ही थी, तो कृष्ण ने यह ज़िम्मेदारी उडुपी के राजा को दे दी.

युद्ध में रोज़ाना हज़ारों लोग मरते थे. ऐसे में भोजन कितने लोगों का बने, ताकि व्यर्थ न हो, इसकी गणित लगाना मुश्किल था. मगर फिर भी उडुपी के राजा की चतुराई से पूरे युद्ध के दौरान न कभी खाना कम पड़ा और न व्यर्थ हुआ. एक दिन राजा से किसी ने पूछा कि ऐसी व्यवस्थित गणना आप कैसे कर पाते हैं कि लोगों के मरने की संख्या जाने बिना भी भोजन न ज़्यादा होता है न कम. तब राजा ने जवाब दिया, ' कृष्ण हर रात को उबली मूंगफलियां खाना पसंद करते हैं. मैं उन्हें छीलकर एक बर्तन में रख देता हूं. वो रात में जितनी मूंगफलियां खाते हैं अगले दिन लगभग उतने हज़ार सैनिक मर जाते हैं. कृष्ण से मरने वालों की संख्या इस तरह पता चल जाती है. उसी के अनुसार खाना बनता है, तो व्यर्थ होने का सवाल ही नहीं.

परिणाम जानते थे कृष्ण फिर भी करते रहे लीला

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यहां समझने की बात ये है कि कृष्ण वो थे जिन्हें सब कुछ पता था, फिर भी वो अपनी लीला खेल रहे थे. वो लगातार अपनी ज़िम्मेदारी के अनुसार युद्ध में भागीदार बन रहे थे. मगर क्या सामान्य मनुष्य के साथ यह संभव है?

सामान्य मनुष्य को अगर यह पता चल जाए कि कल क्या होने वाला है, तो वह कर्म करना छोड़ देगा. अगर उसे पता चल जाए कि एक सप्ताह बाद उसकी मृत्यु निश्चित है तो वो इसी समय से क्षण-क्षण मरने सा महसूस करने लगेगा. ये मनुष्य की सीमित बुद्धि का फेर है कि वो समझता है भविष्य जानने से वो उसे संवार लेगा. वास्तव में जीवन एक रोमांच का नाम है. एक ऐसी यात्रा जहां अगले क्षण का पता नहीं. जिन्हें हम खुशियां कहते हैं वो सामान्य घटनाएं ही होती हैं, मगर उनकी अनिश्चितता ही उन्हें हमारे सामने ख़ुशी के रूप में प्रस्तुत करती है.

इसीलिए कृष्ण ने गीता में कहा था-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्तव्य करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं.