उत्तराखंड के देहरादून के निकट एक गांव के बाशिंदे, देश के पहले ऐसे गांवनिवासी बन गए हैं, जिन्हें Biological Diversity Act, 2002 के तहत जंगलों से फ़ायदा हो रहा है. स्वर्णा Riverbed में हो रहे ग़ैरकानूनी ख़नन को रोकना न तो गांववालों के बस में था और न ही फॉरेस्ट अफ़सरों के हाथ में.

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बड़े पैमाने पर हो रहे ग़ैरकानूनी ख़नन को रोकने के लिए गांववालों और अफ़सरों ने Biodiversity Act का सहारा लिया.

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दुधई Biodiversity Management Committe के चेयरमैन, Rajesh Mall ने बताया,

'हम सब ने मिलकर सोचा कि किसी भी हाल में ग़ैरकानूनी ख़नन रोकना होगा. स्वर्णा नदी के किनारे के सभी जंगल नष्ट हो गए है. हमने रात में गश्त लगाने शुरू किए और ख़नन करनेवालों को Act के नाम पर चेतावनियां भी दीं. फॉरेस्ट विभाग ने भी हमारी पूरी सहायता की.'
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इस Act में साफ़ तौर पर लिखा है कि Bio-Resources को BMC की अनुमति के बिना ख़नन नहीं कर सकते. BMC अधिकारी Isam Singh Pal ने बताया,

'बिना अनुमति के खनन करने वालों को 3 साल की जेल की सज़ा हो सकती है. हमने सभी ख़निकों को बातचीत के लिए बुलाया, उस मीटिंग में ग्राम पंचायत के सदस्य भी थे. धीरे-धीरे वो समझ गए की हम झूठी चेतावनियां नहीं दे रहे थे. '

अफ़सरों को किसी को भी गिरफ़्तार करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. हालांकि इस Act के तहत गांववालें भी ख़नन नहीं कर सकते हैं.

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जंगलों को बचाने के क्रम में गांववालों को भी अपने काम-काज पर रोक लगानी पड़ी हैं. लेकिन इस Act के तहत उन्हें कई आर्थिक लाभ भी मिल रहे हैं. इस Act के तहत, जंगलों और प्राकृतिक संपदाओं का लाभ उठाने वाले सरकारी या ग़ैर-सरकारी महकमें, उनको होने वाले लाभ का कुछ हिस्सा गांववालों को देंगे.

Mall ने बताया,

'BMC ने Uttarakhand Forest Corporation को नोटिस जारी कर दिया गया है कि रोड प्रोजेक्ट के लिए गिराए जाने वाले पेड़ों की लकड़ियों को बेचकर होने वाले लाभ का 3-5 प्रतिशत हिस्सा हमें दिया जाए. हम उस पैसे को Biodiversity के संरक्षण के लिए इस्तेमाल करते हैं.'
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दुधई के तर्ज पर ही देश के बाकी जंगलों को भी संरक्षित किया जा सकता है. बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है.

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