एक सैनिक का बलिदान सर्वोतम व अमूल्य होता है, इसे किसी तराज़ू में तौला नहीं जा सकता. आज अगर अरबों भारतीय घरों में चैन की नींद सो रहे हैं, तो इसमें देश का जवानों का अहम योगदान है. तेज़ धूप, ओले-बारिश, बमबारी सारी मुसीबतों को झेलते हुए ये हमारी सुरक्षा करते हैं, वो भी बिना शिकायत किए हुए. ऐसे में ये कल्पना करना बेहद मुश्किल है कि सैनिकों के परिवार पर क्या बीतती होगी.

देश के इन सपूतों को श्रृद्धाजंलि देने के लिए कई युद्ध स्मारक बनाए गए हैं. एक ऐसा ही युद्ध स्मारक उत्तराखंड की नीलांग घाटी में 11,000 फ़ुट की ऊंचाई पर भी स्थित है. इस स्मारक की ख़ास बात ये है कि यहां वीरों को श्रद्धांजलि देने के लिए फूल नहीं, बल्कि पानी की बोतल अर्पित की जाती है. लेकिन आख़िर ऐसा क्यों?

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दरअसल, ये स्मारक झुम प्रसाद गुरूंग, लांस नायक सुरेंद्र सिंह और भारतीय सेना के 64 फ़ील्ड रेजिमेंट के गनर दान बहादुर को समर्पित है. 6 अप्रैल 1994 में ये तीनों शुष्क इलाके में पानी की तलाश के लिए निकले थे, लेकिन अचानक से हिमस्खलन में फंसने के कारण तीनों सैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई. बताया जाता है कि 1962 में हुए इंडो-चाइना युद्ध के दौरान नीलांग के सीमावर्ती इलाके में रहने वाले ग्रामीणों को स्थानांतरित कर दिया गया था. इसके साथ ही क्षेत्र को अलगे पांच दशकों तक नागरिकों के लिए बंद कर दिया गया था.

इसके बाद उत्तराखंड सरकार द्वारा जब इसे खोला गया, तो यहां आने वाले पर्यटक शहीदों को पानी की बोतल अर्पित कर उन्हें श्रृद्धाजंलि देते हैं.

हमें गर्व है अपने देश के नौजवानों पर, जो देश की आन-बान और शान के लिए अपनी जान गंवा देते हैं. आपका ये बलिदान हमें ज़िंदगी भर याद रहेगा.

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