आप इन्हें इनके गानों की वजह से जानते होंगे, इनकी कहानियों की वज़ह से जानते होंगे, इनके स्टैंड-अप की वजह से जानते होंगे. अगर इन कारणों से भी नहीं जानते होंगे, तब भी आप इनके काम के प्रशंसक ज़रूर होंगे. हम वरुण ग्रोवर की बात कर रहे हैं. जिनके भीतर प्रतिभा का सागर बसता है. अपनी बहुमुखी प्रतिभा से वरुण ग्रोवर न सिर्फ़ आपको प्रभावित करेंगे, बल्कि आपके दिल को अपना कायल बना जाएंगे. और अंत में आप इनकी हिम्मत की दाद देते नज़र आएंगे.

हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर में वरुण की पैदाइश हुई थी. ज़िंदगी की शुरुआत के कुछ बरस वहीं गुज़रें, मां एक शिक्षिका थी और पिता फ़ौज में इंजीनियर थे. बाद में उनका परिवार लखनऊ चला गया, बनारस हिन्दू विश्वविद्याल से 2003 में सिविल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त हुई. इस बीच उनका लिखना चलता रहता था. हालांकि उनका लिखना सिर्फ़ उनके तक ही सीमित था या फ़िर उनकी लिखी हुई चीज़ें चंद दोस्तों तक पहुंचती थी.

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2004 में नौकरी ने पुणे पहुंचा दिया, एक साल तक एक सॉफ्टवेयर कंपनी के साथ जुड़े रहे. लेकिन अंदर का लेखक उन्हें बेचैन कर रहा था. वरुण की कलम उन्हीं से सवाल कर रही थी. कलम और करियर की इस जंग में आखिर में कलम की ही जीत हुई. बिना किसी जान-पहचान और लिंक के वरुण सपनों की नगरी मुंबई पहुंच गए. वरुण एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उन्हें मालूम था कि नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें बतौर लेखक जो काम मिलेगा, उसकी तनख्वाह वर्तमान सैलरी की एक चौथाई भी नहीं होगी.

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2005 में वरुण के करियर की शुरुआत होती है The Great Indian Comedy Show के लेखक के रूप में. वो इस शो के छ: लेखकों में से एक थे, इसके अलावा उन्होंने ख़ुद भी स्टैंड-अप कॉमडी करनी शुरू कर दी. वरुण की कॉमेडी की एक ख़ासियत है, उनके जोक्स पहले हंसाते हैं फिर आपके भीतर हलचल पैदा करते हैं. उनके कटाक्ष गंभीरता की चादर ओढ़े रहते हैं. वरुण ने और भी कई शो के लिए अपनी क़लम को घिसा है, मसलन- दस का दम, Oye! Its Friday. हालांकि वो इस काम को बस मुंबई में गुज़ारा करने के लिए कर रहे थे. वरुण की नज़र फ़िल्म इंडस्ट्री पर थी. वो कुछ बड़ा लिखना चाहते थे, वो फ़िल्म लिखना चाहते थे.

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उस वक़्त एक वेबसाइट हुआ करती थी, जिसपर फ़िल्मी जगत के लोग ब्लॉग लिखा करते थे. वरुण भी उस साइट पर लिखा करते थे, वहां उनकी मुलाक़ात अनुराग कश्यप से हुई. अनुराग ने वरुण को अपने फ़िल्म के लिए गाने लिखने का ऑफ़र दिया. यहां से उनकी कलम ने रफ़्तार पकड़ ली. हालांकि इससे पहले उन्होंने एक कमचर्चित फ़िल्म Accident On Hill Road के लिए संवाद लिखा था. लेकिन वरुण इस फ़िल्म को अपनी भूल मानते हैं.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर, That Girl In Yellow Boots, रमन राघव 2.0, उड़ता पंजाब में वरुण और अनुराग ने साथ काम किया. इसके अलावा वरुण ने 'दम लगा कर हइशा', 'फ़ैन', 'आखों देखी', 'न्युटन' जैसी प्रसिद्ध फ़िल्मों के लिए भी गाने लिखे हैं. 2015-16 में वरुण ग्रोवर को उनके काम के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. वरुण के गानों से कस्बों, गांव की मिटटी की ख़ुशबू आती है. वो शब्दों के साथ एक्सपेरिमेंट भी करते हैं और उसके लोकल टच को मरने भी नहीं देते। इस बात को आप 'फ़ैन' 'के टाईटल ट्रैक 'जबरा फ़ैन' गाने में देख सकते हैं और गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में भी. इस फ़िल्म की पूरी एलबम हिंदी हिंदी फ़िल्म का हिस्सा होते हुए भी भोजपुरी का भाव लिए है.

एक साक्षात्कार के दौरान वरुण ने ये कबूल किया था कि वो गाने दिमाग़ से लिखते हैं और कहानियां दिल से लिखते हैं. अगर आपने 'मसान' देखी है, तो आप भी वरुण की इस बात को समझ जाएंगे. 'मसान' के लिए वरुण की अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई थी.

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फ़िल्मों से जुड़ने के बाद भी वरुण स्टैंड-अप करते रहते हैं, 'पदमावत' पर उनका एक्ट लोगों को काफ़ी पसंद आया. इसके अलावा वो गाहे-बगाहे अलग-अलग मंचों पर भी दिख जाते हैं. स्टैंड-अप के ज़रिए वरुण उन मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं, जो गानों और फ़िल्मों में नहीं कही जा सकती. उनके सामाजिक और राजनीतिक कटाक्ष सुनने वाले को भी असहज कर देते हैं. ऐसा नहीं है कि वरुण कटाक्ष की बंदूक सिर्फ़ सामने वाले पर तानते हैं, कभी-कभी वो ख़ुद पर भी निशाना लगा लेते हैं.