हिन्दुस्तान की पहचान होते हैं किसान! वो किसान, जो दिन भर मेहनत-मज़दूरी कर के पूरे देश का पेट पालते हैं. आजकल इन किसानों का हाल बेहाल हो रहा है. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि वो अपनी जान देने से भी नहीं हिचकिचाते हैं. हमेशा की तरह इस बार भी विदर्भ में मौसम की मार ने किसानों की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है. किसान हताश हैं, निराश भी हैं लेकिन आशावान हैं. वो इतनी जल्दी हार नहीं मानने वाले नहीं हैं. ज़िंदगी जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उम्मीद है कि आख़िरी सांस तक करेंगे, ताकि प्रकृति और सरकार को जता सकें कि हम ही किसान हैं.

अपने वजूद को ज़िंदा रखने के लिए वे अपने गांव-जेवार को छोड़ कर देश के कई महत्वपूर्ण शहरों में पलायन कर रहे हैं, जिससे अपना और अपने परिवार का पेट भर सकें. आजकल दिल्ली इनका ठिकाना बना हुआ है. लेकिन इन सब के बीच इन भद्रजनों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. पेश है एक विशेष रिपोर्ट, जिसमें मैंने उनके बीच में जाकर जो महसूस किया, वो लिख दिया है.

"मैं जीना चाहता हूं, लेकिन परिस्थिति कहती है कि मैं जीने नहीं दूंगी और मौत कहती है कि मैं मरने नहीं दूंगी."

प्रकृति का इतना क्रूर मज़ाक आज तक मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा. देश के कई राज्य इन दिनों सूखे की चपेट में हैं, जिनमें महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके शामिल हैं. यहां के निवासियों के लिए मौत ही ज़िंदगी है और भूख इनकी पहचान है. औरतों और बच्चों की ज़िंदगी संवारने के लिए ये दिल्ली आए हुए हैं. यहां ये मजदूरी करते हैं और उससे मिले पैसों से परिवार का पोषण करते हैं. लेकिन इन सबके बीच कई परेशानियों से गुजर रहे हैं, जिन्हें मैंने महसूस किया. आइए आपको उन परेशानियों से आपको रू-ब-रू करवाता हूं.

'दिल्ली 'दिलवालों' की नहीं 'दलालों' की है'

मध्यप्रदेश के छत्तरपुर के निवासी हल्लु अहरवाल एक ज़मीनदार परिवार के हैं. भुखमरी से बचने के लिए अपने परिवार के साथ वे दिल्ली आए हुए हैं. उनके अलावा उनके साथ उनकी धर्मपत्नी और 8 साल का एक बच्चा है. वे लगभग रोते हुए कहते हैं कि 'दिल्ली 'दिलवालों' की नहीं 'दलालों' की है. लोग हमारी मजबूरी पर तरस नहीं खाते हैं, बल्कि हमें लूटने की साजिश रचते हैं.'

'लोग हमें भिखारी समझते हैं'

बीड़ी पीते हुए टीकमगढ़ के संतोष कहते हैं कि हमारे पास खेत है. हमारी एक अच्छी ज़िंदगी हुआ करती थी. लेकिन दिल्ली वाले हमें भिखारी समझते हैं. लोग हमें ऐसी नज़रों से देखते हैं, मानो दिल्ली आकर हमने कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो.

'गंदी नज़रों से घूरते हैं, लेकिन मजबूरी है'

घूंघट हटाते हुए राम देवी रुआंसी आवाज़ में कहती हैं कि मजबूरी में हमें खुले में ही शौच करना होता है. ऐसे में आस-पास के लोग हमें बड़ी गंदी नज़रों से घूरते हैं. मज़बूरी में ख़ून का घूंट पीकर रहना पड़ता है. वे मध्य प्रदेश के सागर जिले की रहने वाली हैं.

'काम करवा कर पैसे नहीं देते हैं'

फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले लगभग 95 फीसदी लोगों की एक शिकायत है. वे कहते हैं कि यहां ठेकेदार काम करवा कर पैसे नहीं देते हैं. भगवान दास अपनी हाजिरी की दो कॉपी दिखाते हुए कहते हैं कि रोज़ काम करने के बावजूद ठेकेदार पूरे पैसे नहीं देते हैं. ऐसे में हमारे लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है.

'बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है'

अपने बच्चों का भविष्य अंधेरे में जाते देख कई अभिभावक भावुक हो जाते हैं. वे कहते हैं कि हमें अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ने का कोई हक़ नहीं है, लेकिन मजबूरी में करना पड़ रहा है.

'ज़िंदगी अब इतना इम्तिहान न ले'

ऐसा नहीं है कि रह रहे लोग दुखी ही हैं. कई लोगों के चेहरे पर मुस्कान है, वे हंस रहे हैं, आपस में बात भी कर रहे हैं. लेकिन एक दर्द है, जो वो सबसे छुपा रहे हैं.

पलायन करने को क्यों मजबूर हैं ये लोग?

विदर्भ की स्थिति जगजाहिर है. इस साल करीब दो दर्जन से ज्यादा किसान अपनी जीवनलीला समाप्त कर चुके हैं. जो ज़िंदा हैं, वे भी आशंकाओं से घिरे हैं.

यहां कपास और सोयाबीन मुख्य फसलें हैं, लेकिन पानी की किल्लत होने के कारण ये फसलें मर जाती हैं.

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आशावान किसान इस फसल को कई बार लगाने की चेष्टा करते हैं. ऐसे में साहूकारों और बैंकों से क़र्ज़ लेते हैं. वे अपना क़र्ज़ फसल की बिक्री पर ही उतारते हैं. ऐसे में फसल की बर्बादी के कारण वे क़र्ज़ चुकाने में असक्षम रहते हैं. ब्याज के साथ इनकी चिंता भी बढ़ जाती है. मजबूरी में अपनी ज़िंदगी को ख़त्म कर देते हैं.

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'विदर्भ' नेताओं के लिए 'प्रोटीन' है

किसानों की मौत के बाद नेता अपनी राजनीति चमकाने से नहीं चूकते हैं. मीडिया के सामने घड़ियाली आंसू बहा कर, पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की पेशकश भी करते हैं, भले ही वो बाद में इसे भूल जाते हैं.

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आज भले ही इस क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार कई परियोजनाएं शुरू करने जा रही हों, लेकिन एक हक़ीकत यह भी है कि यह एक छलावा ही है. राजनीतिक पार्टियां किसानों से जुड़े मुद्दे उठा कर अपनी राजनीति चमकाती है, पर किसानों की आत्महत्या पर हमेशा चुप हो जाती है. मैं अपने पाठकों से गुजारिश करना चाहता हूं कि अपने स्तर से इन लोगों की मदद करें. इस आर्टिकल को सिर्फ़ पढ़ें नहीं, शेयर भी करें.