आज भले ही देश में कई इलाकों के लोग रोज़गार के लिए अन्य शहरों का रुख करते हों, मगर हमारे देश में एक गांव ऐसा भी है, जहां के लोग रोज़गार के लिए अपने गांव से बाहर नहीं जाते, बल्कि अपने गांव में ही बिज़नेस करते हैं और वो भी 400 करोड़ का बिज़नेस. क्यों चौंक गये न? यकीन मानिए, क्योंकि इस गांव के बिज़नेस की वार्षिक आय 400 करोड़ रुपये है.

भले ही हम लोगों के लिए दिन की शुरुआत सुबह से होती हो, मगर संध्या भांजे की दिन की शुरुआत दोपहर 2 बजे से होती है. वो मछली पकड़ने के लिए समुद्री बीच पर पहुंचती हैं और जब तक सूर्यास्त न हो जाए, तब तक ग्राहकों को मछलियां बेचती रहती हैं. इसके बाद जो मछलियां बचती हैं, उन्हें वो ट्रकों में भरकर क्रॉफर्ड मार्केट में एक्सपोर्ट के लिए भेज देती हैं. उनका परिवार सात मछुआरे जहाज़ों का मालिक है.

दरअसल, यह मुंबई में वर्सोवा का कोलिवाड़ा गांव है. पश्चिमी तट के किनारे बसा यह गांव मछुआरों की पारंपरिक जीवन शैली को पूरी तरह से झूठा साबित कर रहा है. आपको जानकर हैरानी होगी कि सिर्फ़ मछलियों के कारोबार से यहां कई बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हो चुकी हैं. इस गांव में 300 मछुआरे जहाज़ हैं. इस गांव में लगभग 4000 घर हैं, जिनकी सालाना आय 400 करोड़ रुपए है. इसके अलावा इस गांव में कोल्ड स्टोरेज और आइस फैक्ट्री भी है. मछलियों के व्यवसाय से यहां की रहने वाली 'कोली' जनजाति काफ़ी समृद्ध है.

को-ऑपरेटिव कोली महासंघ के जनरल सेक्रेटरी राजहंस तापके के मुताबिक, 'मछली पकड़ने के जिस व्यवसाय को हम यहां फलता-फूलता देख रहे हैं, वह सहकारी संस्थाओं की भूमिका की वजह से संभव हुआ है. पूर्व मुख्यमंत्री शरद यादव हमें शुगर इंडस्ट्री के लिए एक मिसाल के तौर पर पेश करते हैं. हमारा गांव शहर का पहला गांव बना, जहां कोल्ड स्टोरेज और अपनी आइस फैक्ट्री है.'

गौरतलब है कि तपाके खुद और उनके तीनों भाई मछुआरे जहाज़ों के मालिक हैं. गांव की बहुमंज़िला इमारतों में इनकी इमारतें भी शामिल हैं.

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वर्तमान में गांव में 4 सहकारी सोसायटीज़ हैं, लेकिन वसव मच्छीमार विविधकार्यकारी सहकारी सोसायटी लिमिटेड के सबसे ज़्यादा सदस्य हैं. इस सोसायटी में 4000 सदस्य और 271 मछुआरी नावें हैं.

15 साल पहले तक सोसायटी ही मछली की बिक्री की ज़िम्मेदारी संभालती थी. फिर व्यवसाय में तेज़ी आई और अब हर मछुआरा खुद ही सौदा करता है.

यहां की संपन्नता कोलिवाड़ा में हुए बदलाव की कहानी कहती है. यहां एक-दूसरे से लगी हुईं बहुमंज़िला इमारतें दिखाई देती हैं. ये इमारतें इतने पास-पास हैं कि खिड़कियों से दूसरी इमारत में जाया जा सकता है. संगमरमर, ग्रेनाइट और घरों में गैजेट्स खुद ही बयां कर देते हैं कि यहां मछली का कारोबार कितना फल-फूल रहा है.

वसव सोसायटी के चेयरमैन राजेंद्र काले के मुताबिक, वर्सोवा में 3000 सक्रिय मछुआरे हैं, इस व्यवसाय में 5000 लोगों को काम दिया जा रहा है. इस व्यवसाय को पुरुष प्रधान माना जाता है, लेकिन यहां के 80 प्रतिशत घरों की महिलाएं इसमें भागीदारी निभा रही हैं. वे निर्यातकों से डील भी फ़ाइनल करती हैं.

यहां 25-30 मछुआरे जहाज़ रोज़ाना ताज़ी मछलियां पकड़कर लौटते हैं. एक मछुआरा जहाज़ लगभग 3 लाख रुपए की मछलियां पकड़कर लाता है. समुद्र किनारे लगभग एक सप्ताह गुज़ारने के बाद ये लौटते हैं और कम से कम महीने में तीन बार समुद्र किनारे जाते हैं.

इसके अलावा, राजस्व के अन्य स्रोतों में वर्सोवा का फ़िश फ़ेस्टिवल भी है, जिसे यहां 2005 से आयोजित किया जा रहा है. इस साल गांव में 60 स्टाल्स लगाए गए थे, जिसमें से हर एक स्टॉल ने 5-6 लाख रुपए की कमाई की. इस फेस्टिवल से ही करीब 4 करोड़ रुपए की कमाई हुई.

हालांकि, समुद्र में सीवेज का गंदा पानी बहाने की वजह से यहां का कारोबार प्रभावित हो रहा है. अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए 50 नॉटिकल मील्स की दूरी तय करनी परड़ती है. वर्सोवा का पानी बहुत गंदा हो चुका है और काफ़ी लोग यहां मछली पकड़ना बंद कर चुके हैं.

News source: timesofindia
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