अनुराग कश्यप की फ़िल्म आ रही हैं, नाम है 'मुक्काबाज़'. कल ही ट्रेलर आया है. इस दमदार ट्रेलर को देख कर हर किसी के ज़हन में एक सवाल आ रहा है कि ये पॉवरहाउस एक्टर कौन है. कुछ को चेहरा देखा-देखा लग रहा है पर नाम कम ही लोगों को पता होगा.

तीन मिनट का ट्रेलर देखने के बाद लोगों के ज़हन में दो ही सूरतों में ये सवाल कौंधता है. पहली सूरत होती है कि हीरो देखने में बहुत आकर्षक हो और दूसरा केस होते हैं विनीत कुमार सिंह जैसे अभिनेता. वो एक्टर जो दिखने में तो साधारण होते हैं लेकिन ऐसा जानदार अभिनय करते हैं कि आप ट्रेलर देखते हुए ही सोच लेते हैं इस बंदे को जानना है, है कौन ये!

अगर आप सिनेमा प्रेमी हैं, तो आपको 'Ugly' फ़िल्म का चैतन्य मिश्रा याद होगा, वो धूर्त कास्टिंग डायरेक्टर जो राहुल का दोस्त था.

'बॉम्बे टॉकीज़' का विजय याद है आपको? जो अमिताभ बच्चन को अपनी मां के हाथ का बना मुरब्बा खिलाने के लिए जतन कर रहा होता है. एक प्रशंसक के अपने चहेते सितारे के लिए जुनून की कहानी में विजय के किरदार ने जान फूंक दी थी.

'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' का दानिश खान तो ज़रूर याद होगा, जो अपने बाप सरदार खान की हत्या का पता चलने पर एक आदमी को पुलिस के सामने कूट-कूट कर मार डालता है.

ये सभी किरदार विनीत ने निभाए हैं. लोगों को किरदार तो याद रह गए लेकिन एक्टर का नाम नहीं. एक एक्टर के तौर पर ये विनीत की सबसे बड़ी जीत है कि लोगों को उनका नाम भले ही याद न रहा हो, लेकिन इन किरदारों को वो भुला नहीं पाए.

इनका चेहरा आपको देखा-देखा लग रहा है क्योंकि लगभग 20 छोटी-बड़ी फ़िल्मों में वो काम कर चुके हैं. किसी टीवी शो में भूत का रोल किया, तो किसी फ़िल्म में हीरो के बाप का रोल (फ़िल्म:Crook). विनीत का काम ऐसा है कि पीयूष मिश्रा, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, रोनित रॉय जैसे अभिनेताओं के बीच भी वो अपनी मौजूदगी अलग से जाता देते हैं.

उत्तर प्रदेश के रहने वाले विनीत कुमार सिंह असल में खान हैं, टैलेंट की.

विनीत के पिता नामी गणितज्ञ थे. पिता चाहते थे बेटा डॉक्टर बने, तो विनीत ने डॉक्टरी पढ़ ली. CPMT एग्ज़ाम निकाला, मेडिकल कॉलेज में टॉप भी किया, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और नागपुर से डॉक्टरी की डिग्री लेकर वो आयुर्वेद के लाइसेंस्ड डॉक्टर बने. लेकिन डॉक्टरी से वो संतुष्ट कैसे हो जाते... मन में तो एक्टिंग का कीड़ा था.

1999 में 'सुपरस्टार टैलेंट हंट' में न सिर्फ़ उन्होंने हिस्सा लिया, बल्कि शो जीता भी. शो जीतने की ख़ुशी कुछ दिन रही लेकिन इस शो से उन्हें कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिल सका. बस वो असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने लगे.

2005 में अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म 'विरुद्ध' में वो असिस्टेंट डायरेक्टर थे. अमिताभ बच्चन को सेट पर देख उनका सपना बन गया था कि एक बार उनके साथ काम करें, ये तमन्ना पूरी हुई 2013 में जाकर, जब उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ 'बॉम्बे टॉकीज़' में काम किया.

जब बॉलीवुड में उनकी इतनी पूछ नहीं थी, तब उन्होंने बांग्ला, भोजपुरी और मराठी फ़िल्मों में भी काम किया. अनुराग कश्यप के साथ आज बड़े-बड़े एक्टर काम करना चाहते हैं और विनीत की उनके साथ ये चौथी फ़िल्म है. यहां तक आने के लिए उन्होंने उस स्तर का संघर्ष किया है, जो अच्छे-अच्छों का हौसला तोड़ सकता है.

विनीत का एक्टिंग के लिए जूनून ऐसा है कि 'Ugly' फ़िल्म के पुलिस रिमांड सीन को जीवंत करने के लिए उन्होंने असल में 50 थप्पड़ खा लिए. उनके समर्पण को देख अनुराग कश्यप और गिरीश कुलकर्णी ने उन्हें गले लगा लिया था. विनीत ने ही फ़िल्म का टाइटल ट्रैक लिखा था और उसे गाया भी.

'मुक्काबाज़' फ़िल्म का गाना 'पैंतरा' भी उन्होंने खुद लिखा है. जिस फ़िल्म का ट्रेलर आज देखने वालों के रोंगटे खड़े कर रहा है, उस फ़िल्म की कहानी विनीत ने 2013 में लिख ली थी. फ़िल्म बनने में इतने साल क्यों लगे ये भी जान लीजिये.

उनकी स्क्रिप्ट पर फ़िल्म बनाने में और स्क्रिप्ट ख़रीदने में कई लोगों ने दिलचस्पी दिखाई, लेकिन उन सभी के सामने विनीत ने एक शर्त रखी. शर्त ये थी कि फ़िल्म बनेगी, तो हीरो वो ही होंगे. 3 साल स्क्रिप्ट लेकर घूमने के बाद ये शर्त पूरी की अनुराग कश्यप ने और आज परिणाम सबके सामने है.

जब इस फ़िल्म का बनना तय हुआ, उसी दिन विनीत इस फ़िल्म की ट्रेनिंग के लिए पंजाब चले गए. फ़िल्म के लिए उन्होंने फ़िल्मी ट्रेनिंग न लेकर, 125 बॉक्सरों के साथ एक ट्रेनिंग सेंटर जॉइन किया. वहां उन्होंने शुरू में ये बात किसी को नहीं बताई कि वो फ़िल्म के लिए ट्रेनिंग ले रहे हैं. अन्य बॉक्सरों के साथ वो रोज़ प्रेक्टिस करते. जाने कितनी बार इस दौरान वो लहुलुहान हुए, एक पसली भी तुड़वा ली. एक दिन उनके कोच ने पूछा कि वो रोज़ इतना पिटने के बाद भी ट्रेनिंग क्यों ले रहे हैं. उस दिन उन्होंने उसे सच बताया.

उस दिन से वो रोज़ सुबह पांच बजे से ट्रेनिंग करना शुरू करते और आठ घंटों तक ट्रेनिंग करते. ये तपस्या उन्होंने एक साल तक की. इसके दो नतीजे हुए, पहला ये कि अब विनीत कहते हैं कि उन्हें किसी बॉक्सर से डर नहीं लगता और दूसरा आपको ट्रेलर में दिख ही रहा है.

19 साल कम नहीं होते, लौट जाने का ख़्याल भी बहुत ढीठ होता है. वो नहीं लौटे क्योंकि इस ख़्याल से ज़्यादा ढीठ था उनका जुनून, वो जुनून जो अब दुनिया को भी दिखने लगा है. आज विनीत के एक इंटरव्यू के लिए पत्रकारों में होड़ लगी है. ये वो ही आदमी है जिसकी ज़िन्दगी का पहला इंटरव्यू उसके मुंबई आने के 14 साल बाद लिया गया था.

19 सालों में उन्होंने कई दोस्तों को हार मान कर मुंबई से लौटते देखा. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जब वो अपने दोस्तों की पैकिंग में मदद करते और उनके बैग में सामान भरते, तो उन्हें लगता जैसे वो उनका सामान नहीं, उनके सपने पैक कर रहे हैं.

विनीत ने अपने सपने पैक नहीं किये. विनीत ख़ुद जुनून हैं और ये जूनून ही उनका पैंतरा है.